Loading...

तो गाडी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी, हम सब मंजिल से थोड़ा ही दूर थे क़ि रास्ते में एक चौराहा पड़ा| हमेशा की तरह ही वहा छोटे छोटे बच्चे अपनी जीविका चलाने के लिए कुछ न कुछ बेचने मे व्यस्त थे, गाड़ी चलने ही वाली थी कि मेरा ध्यान अपनी 4 वर्ष की…

Loading...

ज़िंदगी भी अजीबोगरीब है, न जाने कब कहा और क्यों?? बहुत कुछ नया सिखाती है राहों पे चलते चलते दोड़तें दोड़तें हर एक मोड़ पर नया आयाम दे जाती है जो आज सच लगता है कल शायद झूठ दिखे अथवा विपरीत आज जो विचार किसी विषय को लेके है वो जरुरी नहीं कल भी वेसे…

Loading...

  सुबह-शाम पार्क में खुले वातावरण में घूमने-फिरने से मन तरोताज़ा हो जाता है और सेहत के लिए भी अच्छा होता है। इसीलिए लोग सुबह-शाम पार्क में टहल लिया करते है। रवि भी कुछ दिनों से शाम को पार्क में टहलने आ रहा था। कुछ देर खुली हवा में बैठकर और थोड़ी देर टहल के…

Loading...

हर्ष आज अपने दोस्तों के साथ बाजार घूमने चला गया। उसे घूमने-फिरने का बहुत शौक था, उसके लिए तो वह कोई न कोई बहाना ढूंढ ही लेता था। उसकी उम्र तकरीबन ग्यारह वर्ष की होगी। बचपन से उसे अलग-अलग जगहों पर घूमने-फिरने की हमेशा उत्सुकता रहा करती थी। घर में उसे बाहर अकेले घूमने-फिरने की…

Loading...

मनोज अपने पाँव पटकते हुए घर से निकल गया, मन ही मन पता नही क्या-क्या बड़बड़ा रहा था, चेहरे पर गुस्सा झलक रहा था, आँखे लाल हो गई थी, आँखों में पानी था और सीधे तालाब के पास खाली जगह पर पहुँच गया। आज दूसरो के पेड़ से आम तोड़ते हुए उसके बड़े भैया ने…

Loading...

एक ऐसे नवाब की कहानी जो नवाब नहीं होते तो सबके लिए बढ़िया था। ये हाथियों को जूते पहनाते हैं, कबूतरो  पर आक्रमण करवाते हैं और सियारों को…वो खुद पढ़िए! “कहानी बिहार के एक छोटी सी रियासत की है। माना जाता है कि ये अंग्रेजों के जमाने से भी पुरानी बात है। उन दिनों वहां…

Loading...

शहरी लोगों को नहीं पता होता है कि गांव क्या होता है, खेत क्या होते हैं, पोखर क्या होता है। हालांकि उनको कुछ बेहतर पता होती हैं। जैसे- पछतावा, ग्लानि और शर्मिंदगी। गांव के लोग इन चीजों के बारे में कुछ नहीं जानते… बरसात का मौसम चरम पर था। तालाब, पोखर वगैरह सारे भरे हुए…

Loading...

    मैंने जैसे ही उसका साथ छोड़ा ….. उसके बदनाम रिश्ते का अंत वैसे ही धीरे-धीरे होने लगा । भला बदनाम रिश्तों की भी कभी कोई उम्र हुआ करती है ? ~ प्रवीण गोला

Loading...

हाँ इस ओर तिरंगा था और उस ओर चाँद-सितारा। जोश भी वही था, सम्मान भीवही। एक सी ही तो थी हवाओं में वो माटी की खुशबू।एक से ही लोग थे, एक सा ही भेष।एकसी ही बोल थी और एक सा ही देश। एक शाम दोस्तों के संग मैं निकला था घूमने। अपने देश की शान को आँखों से…

Loading...

माना कि लाइफ फ़ास्ट हो गयी है,हमारी जरूरतें भी काफी भास्ट हो गयी हैं, इनसब को पूरा करने के लिए ‘सक्सेसफुल’ तो बन गए हैं हम, पर इस बीच कहीं इंसानियतलॉस्ट हो गयी हैं।     मुँह पर लगाकर ख़ामोशी का ताला, आँखों पर बांधकर पट्टी। कानो को हाथों से ढककर, हम बढ़ जाते हैं…