इक्कीसवीं शताब्दी के ढोंग और माँ के विश्वास के बीच की कश्मकश|

 

 

घर की दहलीज के बाहर अभी पहला कदम रखा ही था कि, किसी के छींकने की आवाज आयी! पीछे से माँ ने टोका, ‘दो मिनट रूक कर निकलना!’ दो मिनट बाद घर से बाहर निकला, रास्ते में अंतर्मन ने सवाल किया- यार-दोस्तों के बीच या जब कॉलेज में यह सवाल उठता है कि, कौन-कौन अंधविश्वास को नहीं मानता है? तब तो चहरे पे दिखावटी नकाब पहन झट से हाँथ खड़ा कर देते हो, और फिर खुद को, ‘अथिसट’ और ‘एगनोस्टिक’ नामक फैशनेबल श्रेणी का ‘कैंडिडेट’ बताते हो! आज माँ ने एक बार क्या टोका, सारे मार्डन विचारों पे ताला लग गया? ये जो हर बात पर अपना सीना ठोक के खुद को इक्कीसवीं सदी का ब्रांड-एम्बेसडर बताते हो, क्या हुआ उन हवाबाजीयों और खुद को ‘कूल’ दिखने वाले ढोंग का! अब भला मन को कौन समझाए की, यूँ तो मैं अंधविश्वास को नहीं मानता, पर आखिरकार अपनी माँ को तो मानता हूँ! और इस जहाँ में माँ से बढ़कर कुछ और कहाँ!

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