कई बार बचपन की हरकतों को याद करते ही चेहरे पर एक हँसी आ जाती है। जब भी बचपन की यादें ताज़ा होती है तब चेहरे पर एक नया भाव होता है, इस भाव में लीन होते ही कई बार ख़ुशी के आँसू निकल जाते है तो कई बार एक विस्मयकारी हँसी आ जाती है। ऐसे बहुत कम ही मौके होते है जब व्यक्ति यादों के कारण दुःखी हो जाये और उसके हृदय के फटने की वजह से आँखों से आँसू निकल जाये। बचपन की इन यादों का भी अपना अलग ही महत्व है। कुछ यादें सुखद होती है तो कुछ दुखद, पर दोनों जिंदगी भर के लिए अमर हो जाते है।

यश के लिए आज का दिन बड़ा ख़ास था। चार वर्षों बाद वह पूरे परिवार के साथ दादी-दादी के पास अपने पुश्तैनी घर जा रहा था। चार वर्ष पहले ही यश के पिता का तबादला शहर में हुआ था, जभी से यश अपने माता-पिता के साथ शहर में आ गया था। उसके बाद से यश के पिता का तो कई बार अपने घर आना जाना हुआ पर यश को ऐसा मौका न मिला। यश का दाखिला शहर के बढ़िया विद्यालय में करा दिया था, जब वह नौवीं कक्षा में गया था।  पढ़ाई के कारण उसे कभी गाँव जाने का मौका न मिला। अब उसकी बारहवीं की पढ़ाई पूरी हो गई थी, छुट्टियों का समय था, घर में चचेरी बहन की शादी होने वाली थी। इस आयोजन के कारण ही उसे वर्षों बाद अपने दादा-दादी से मिलने का मौका मिल रहा था।

तकरीबन दस घण्टों के सफ़र के बाद यश अपने घर पहुँचा। घर पर भी इनका सभी बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। घर पहुँचते ही यश ने सभी बड़ो को प्रणाम किया, सभी का घर में स्वागत किया गया। लंबे सफ़र के कारण सब थकावट महसूस कर रहे थे। हाथ-पाँव धोकर सभी खाना खाने के लिए बैठे, खाना परोसा गया, सबने बड़े चाव से खाना खाया। इसके बाद थकावट दूर करने के लिए सभी ने आराम फ़रमाया। यश को किसी तरह की थकावट नही हो रही थी, उसे तो घूमने की पड़ी थी। यश उठा और पूरे घर में घूमने लगा और पुरानी यादें ताज़ा करने लगा। घर तो जैसे का तैसा ही था, घर की एक ईंट भी इधर से उधर नही हुई थी, उसी रंग की दीवारें थी, कुछ सामानो की जगह में अंतर आया था, साथ ही साथ घर में कुछ नए सामान दिखाई दे रहे थे। वह हर एक सामान पर गौर कर रहा था, नए सामानो को तो हाथ लगा-लगा कर देख रहा था। यूँ घर निहारते-निहारते तकरीबन घण्टा बीत गया। इसके बाद  वह छत पर घूमने निकला। छत से वही गजब का नज़ारा था, घरो के बीच-बीच में बाग़-बग़ीचे दिखाई पड़ रहे थे, खाली पड़ी जगह पर अब कुछ नए घर दिखाई पड़ रहे थे, कुछ घर एक मंज़िला से दो मंज़िला हो गए थे। शाम का वक़्त हुई छत पर खड़े-खड़े निहारते हुए ही निकल गया। इस दिन यश घर से बाहर घूमने के लिए नही निकल पाया। अब उसे रात ख़त्म होने का इंतज़ार था, सुबह में उसे अपने बाग़-बग़ीचे घूमने की जल्दी थी।

सुबह होते ही यश अपने पापा और दादा के साथ अपने बाग़-बग़ीचे देखने निकल गया। एक-एक गली यश को याद थी। कुछ मिनट में वे सब बगीचे पहुँच गए। दादा जी ने वहाँ यश को उसका अमरुद का पेड़ दिखाया। अमरुद का पेड़ बड़ा हो गया था, पूरा पेड़ अमरूदों से लदा पड़ा था, दादा जी ने एक अमरुद तोड़ कर यश को दे दिया। रवि को बचपन से ही अमरुद बड़े प्यारे थे। अभी से पाँच वर्ष पहले रवि ने कलम से पेड़ उगाने के तरीके के बारे में पढ़ा था। तभी रवि ने अपने दादा से जिद्द करके अमरुद की कलम मंगवाई थी। उस अमरुद के कलम को यश ने बगीचे में लगा दिया था। तब वह रोज उसकी देखभाल करता, घण्टों उसी के पास रहता, जो बन पड़ता सब करता था। एक वर्ष तक उसने इसकी देखभाल की, उसके बाद वह शहर आ गया और उसका रिश्ता उस पेड़ से टूट गया। इस एक वर्ष में पेड़ बड़ा तो हुआ पर कोई फल नही फला था। उसके जाने के बाद से उस पेड़ की देखभाल का जिम्मा दादा जी पर आ गया और उन्होंने ही अबतक उसका ध्यान रखा था। आज के दिन यश ने अपने उगाये पेड़ का पहला अमरुद खाया था। उस पेड़ को अमरूदों से भरा देख बड़ी ख़ुशी हुई। यश पेड़ पर चढ़ गया और अमरुद तोड़ कर खाने लगा। इसके साथ-साथ उसकी कुछ और यादें भी ताज़ा हो गई।

यश उस वक़्त तकरीबन आठ वर्ष का रहा होगा। तब वह गाँव में ही रहता था। बचपन में दादा-दादी के लाड़ प्यार में बहुत सी शरारतें सुनने को मिलती रहती थी। उस वक़्त यश की गाँव में दोस्तों की एक टोली हुआ करती थी। पूरी टोली एक साथ विद्यालय जाती और फिर दिन भर एक साथ खेलती-फुदकती। ये सब बच्चे बड़े शरारती थे, आये दिन सब मिलकर दूसरों के बाग़-बगीचे में घुस जाते और फिर उसके साथ छेड़खानी करते। आये दिन नई नई बदमाशियां पता चलती रहती। इन कामो में एक काम था, दूसरो के पेड़ से अमरुद तोड़ कर खाना, और जो अच्छे न लगे उसे फेंक देना। ये तो रोज की बातें थी पर एक दिन कुछ अलग ही हुआ।

उस दिन रोज की तरह यश अपनी पूरी टोली के साथ अमरुद के पेड़ पर चढ़ गया। अमरुद का पेड़ अमरूदों से लबालब था। कुछ अमरुद कच्चे थे तो कुछ पक्के। बच्चों को इनकी पहचान ही कहाँ थी, उन्हें जो अमरुद दिखता, तोड़ लेते थे। अगर अमरुद पसंद आया तो पेट पूजा हो जाती, अगर पसंद न आया तो मुँह लगा अमरुद फेंक देते। जब दो-चार अमरुद से पेट भर जाता तब अमरूदों को तोड़ते और इससे मारम-पिट्टी का खेल खेलने लगते, इसमें सबको बड़ा मज़ा आता। यश भी बड़े मज़े से इन हरकतों को अंजाम दे रहा था। कुछ देर बाद बग़ीचे का मालिक आ गया, पर बच्चे खेलने में इतने लीन थे कि उन्हें पता ही नही चला। अमरुद के मारम-पिट्टी के खेल में एक अमरुद मालिक के आँख पर जा लगा और वह चिल्ला उठा, तब जाकर बच्चों का ध्यान वहाँ गया। बच्चों ने जैसे ही मालिक को देखा वैसे ही सब पेड़ से कूद-कूद कर भागने लगे, उधर मालिक गुस्से में तिलमिला रहा था, वह बच्चों को पकड़ने के लिए दौड़ा। इतने में सब बच्चे तो निकल गए पर एक बच्चा मालिक के हाथों आ गया। मालिक ने उसे कसकर पकड़ लिया और एक थप्पड़ जड़ दिया। यश भी वहाँ से निकल चुका था पर जब उसने एक बच्चे को फंसा देखा तो उसका मन नही माना। यश तुरन्त पीछे से दौड़ा-दौड़ा आया और मालिक को जोर से दाँत काट लिया। दर्द के मारे वो बच्चा उसके हाथ से छूटा, छूटते ही यश ने उस बच्चे का हाथ पकड़ा और दौड़ पड़ा। मालिक ने यश का भी चेहरा देख लिया था। यश भागते-भागते अपनी टोली के पास ही जाकर रुका। टोली के सभी बच्चों ने उसकी इस बहादुरी पर कंधों पर उठा लिया और घुमाने लगे। सभी ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर की ओर चल दिए। यश भी ख़ुशी-ख़ुशी घर की ओर निकला। घर पहुँचते ही देखा मालिक वही बैठा है और पापा गुस्से में है। चुपचाप दबे पाँव घर में घुसने की कोशिश करने लगा पर यश को उसके पापा ने पकड़ ही लिया और फिर पिटाई शुरू। वो तो भला हो दादा जी का जिन्होंने बीच में आकर यश को बचा लिया वरना उस दिन पापा ने तो हाथ-पैर तोड़ ही दिया होता। दादा जी ने पापा को शांत करवाया और फिर यश को माफ़ी मांगने को कहा। यश ने बग़ीचे के मालिक और पापा से माफ़ी मांग ली। दादा जी ने बड़े प्यार से यश को समझाया और वादा लिया कि वह भविष्य में कभी ऐसा नही करेगा।

अमरुद खाते-खाते यश की ये सभी यादें ताज़ा हो गई। उसके चेहरे पर एक हँसी आ गई। अपनी बचपन की हरकतें उसे ख़ुशी दे रही थी।  साथ ही साथ अब उसे उस बगीचे के मालिक पर दया आ रही थी जिसको उसने दाँत काट लिया था। अपनी उस बहादुरी पर नाज़ हो रहा था। उस खट्टी-मिट्ठी याद ने मन तरोताज़ा कर दिया था। उसने अमरुद को एक शरारती निग़ाहों से देखा और हँसने लगा।

 

 

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