कुछ महीनों से गाँव में कंचों का ट्रेंड चल रहा था। गाँव में हर दूसरा बच्चा कंचों के साथ खेलते हुए दिखाई देता था। रंग-बिरंगे, गोल-गोल कंचें जो बच्चों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। ये कंचों का खेल बच्चों को बहुत लुभा रहा था। गाँव की मिट्टी में सने हुए हाथ-पाँव की परवाह किए बिना बच्चे कंचों के खेल में घण्टों बिता देते और समय का पता ही नही चलता था।

बारह वर्षीय अजय एक होनहार छात्र था जो  हमेशा अपनी कक्षा में अव्वल रहता था। शिक्षकों की नज़रों में अजय एक आदर्श छात्र था। अजय अपनी माता-पिता की इकलौती संतान था, बचपन से ही माँ-बाप का लाडला व आज्ञाकारी बच्चा था। अजय के ज़्यादा मित्र न थे और न ही ज़्यादा किसी से बातचीत होती थी। अजय अपने दो दोस्तों राजू और रवि के साथ स्कूल जाता और उन्हीं के साथ घूमता-फिरता था। अजय की अपनी कक्षा में अमित से हमेशा अनबन होती ही रहती थी। अमित एक तगड़ा और शरारती बच्चा था, आये दिन सबको परेशान करने का बहाना ढूंढता रहता था। उसे कक्षा में सभी शरारती और बिगड़ैल बच्चों का लीडर कहा जा सकता था। क्योंकि अजय होनहार और अध्यापकों का चहेता छात्र था तो उसे अमित से निपटने में कोई दिक्कत नही होती थी।

कंचों का खेल पूरे गाँव के बच्चों को लुभा रहा था पर अजय अबतक इन खेलों से दूर था। यहाँ तक कि उसके दोनों दोस्तों को भी कंचों की लत लग गई थी। एक शाम की बात है अजय अपने दोस्तों राजू और रवि के साथ शाम को पार्क चला गया। वहाँ राजू और रवि के नए-नए दोस्त थे, जिनके साथ वे रोज कंचें खेला करते थे।

“तुम भी कंचें खेलोगे?”- रवि ने अजय से पूछा।

“नहीं-नहीं”- अजय ने उत्तर दिया।

“खेल लो, बड़ा मज़ा आएगा, तुम्हें कंचें मैं दे दूंगा।”- इस बार राजू ने अजय को आमंत्रित किया।

“नहीं, तुम ही खेलो, मैं देख लूंगा।”- अजय ने आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया।

“जैसी तुम्हारी मर्ज़ी”- राजू ने कहा।

इसके बाद राजू और रवि अपने नए दोस्तों के साथ कंचें खेलने लगे। कंचें के खेल का उसूल है, जो हारेगा उसे अपने कंचें जीतने वाले को देने पड़ते हैं। अजय वहीं एक बेंच पर बैठ गया और रवि व राजू को खेलते देखने लगा। आज अजय कंचों को पहली बार इतनी करीब से देख रहा था। सुंदर-सुंदर, गोल-गोल, रंग-बिरंगे कंचें अजय को अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। कंचों का खेल अजय को लुभा रहा था। शाम ढलने लगी तो अजय अपने दोस्तों के साथ घर वापिस लौट आया।

अगले दिन अजय फिर से राजू और रवि के साथ पार्क गया। आज अजय ने स्वयं कहा-” तुम मुझे कंचें खेलना सिखाओगे?”

“हाँ-हाँ, क्यों नहीं”- दोनों ने एकसाथ हामी भर दी।

इस दिन राजू और रवि ने मिलकर अजय को कंचें खेलना सीखा दिया। कुछ प्रयासों में ही अजय ने कंचा खेलना सीख लिया। शाम ढलने तक अजय अपने दोस्तों के साथ कंचें खेलता रहा। इस खेल में वह मंत्रमुग्ध हो गया था। शाम ढलने पर वे सब वापस घर लौट आए।

अजय ने ठान लिया था, अब वह कंचें खरीदेगा। कुछ दिनों पहले अजय अपने परिवार के साथ दशहरे के मेले में गया था। वहाँ मेले से लौटते वक्त उसे पापा ने बीस रुपये  खाने-पीने के लिए दिए थे पर उसने पैसे खर्च नही किये थे। उसने ये पैसे आने वाले वक्त के ख़र्च के लिए बचा लिए थे। आज उसने उसी बचत से दस रुपये निकाले और दुकान की ओर दौड़ गया। अजय ने पूरे दस रुपये के कंचें खरीद लिए, कुल चालीस कंचें आये थे। उन कंचों को एक थैले में छुपा कर घर ले गया। उसे अब कंचों के लिए एक सुरक्षित स्थान की जरूरत थी। उसके स्कूल बैग के सिवा उसके पास कोई सुरक्षित स्थान नही था। उसने उन कंचों को अपने स्कूल बैग में रख लिया।

अगले दिन शाम को फिर वो राजू और रवि के साथ अपने सारे कंचें लेकर पार्क पहुँचा। तीनों ने आपस में कंचों का खेल प्रारम्भ किया। शुरुआत में तो अजय अपने दोस्तों से हार रहा था परन्तु बाद में वह अपने दोस्तों से जीतने लगा। शाम ढलने  तक अजय ने अपने कंचों की संख्या चालीस से बयालीस कर ली थी। उन कंचों को एक छोटे से थैले में छुपाकर घर ले गया।

अजय रोज शाम को पार्क जाता और कंचें खेलता। उसे कंचों का एक नशा चढ़ने लगा था। धीरे-धीरे उसने कंचें खेलने वाले नए-नए दोस्त बनाने शुरू कर दिए। अब वो कई बच्चों के साथ कंचें खेलने लगा था। वह ज्यादा से ज्यादा खेलता ताकि वो अपने कंचें की संख्या बढ़ा सकें। कंचें के खेल के कारण अमित भी अजय का दोस्त बन गया था। हफ़्ते भर में ही अजय ने अपने कंचों की संख्या सौ कर ली थी। अमित पर कंचों का नशा ऐसा चढ़ा कि उसने पढ़ना-लिखना बन्द कर दिया। उसका व्यवहार बदलने लगा था।

एक दिन अजय अपने पुराने मित्र रवि और राजू के साथ कंचें खेल रहा था। उस दिन अजय ने अपने दोस्तों को कई मैच हरा दिए। रवि और राजू ने कई हार के बाद खेल समाप्त करने की सोची पर अजय ने उन्हें खेलने के लिए उकसाया। नतीज़ा ये हुआ उस दिन रवि और राजू अपने सारे कंचें हार गए। अजय ने उनके सारे कंचें छीन लिए। दोनों ने अजय से कुछ कंचें उधार मांगे पर अजय ने देने से मना कर दिया। अजय के इस घमंडी रूप को देखते हुए दोनों ने अजय से अपनी दोस्ती तोड़ दी। इस दिन के बाद राजू और रवि ने अजय से बात करना ही बंद कर दिया।

अजय का घमंड बढ़ता जा रहा था। उसकी पढ़ाई का स्तर निरन्तर गिरते जा रहा था, उसका व्यवहार भी बदलते जा रहा था। कक्षा में हर विषय के यूनिट टेस्ट हुए, सभी में अजय के कम अंक आये। सभी अध्यापक अजय के गिरते अंकों से हैरान थे। इन ख़राब परिणामों के बाद भी अजय जस का तस रहा। अब तो वह पहले से भी ज़्यादा वक्त कंचें खेलता रहता था। स्कूल से घर लौटते वक्त भी पार्क में कंचें खेलने लगा।

एक दिन की बात है अजय स्कूल के बाद अमित के साथ कंचें खेल रहा था। उस दिन अजय और अमित में कंचों को लेकर झड़प हो गई। इस झड़प के बाद अजय अपने कंचें बैग में लेकर घर की ओर भागा पर अमित ने अजय को रास्ते में ही पकड़ लिया। अमित तगड़ा था, उसने अपनी ताकत से अजय का बैग खींच लिया और उससे कंचें निकालने लगा, इस बीच अजय ने इसका विरोध करने की कोशिश करने लगा, बैग की खींचातानी में एक मुट्ठी कंचें अमित के हाथ लग गए और कुछ कंचें सड़क पर बिखर गए। अमित कंचें लेने के बाद वहाँ से निकल गया। अपने कंचों को जाता देख अजय की आँख में आँसू आ गए थे। वो रास्ते पर कंचें बीनने लगा, कंचों के ऊपर से ठेले व रिक्शे निकल रहे थे, उन रिक्शों के बीच में जा-जा कर वह कंचें बीन रहा था। उस वक्त उस रास्ते से राजू भी निकला पर उसने अजय की कोई मदद न की और मुँह फेर लिया। आज अजय को अपने दोस्त खोने का अहसास हुआ। आज उसकी स्थिति ऐसी थी कि वह न तो अमित से इस लड़ाई के बारे में घर पर बता सकता था न ही अध्यापकों से। अजय मुँह लटकाए गुस्से में बचे हुए कंचें लिए घर निकल गया।

घर में अजय को मम्मी ने खाने की थाली परोसी पर अजय ने खाना खाने से इंकार कर दिया। जब माँ ने जिद की तो अजय ने थाली को हाथों से ठोकर मार दी। अजय के पापा भी कई दिनों से उसके बदलते व्यवहार को देख रहे थे, आज उसकी इस हरकत पर उन्होंने अजय को एक थप्पड़ जड़ दिया। अजय बिन खाना खाए ही अपने कमरे में  चला गया। उसकी आँखों से सिर्फ़ आँसू निकल रहे थे। जिस पिता ने आजतक उसे डाँटा भी नही था और आज उन्होंने अजय पर हाथ उठाया था।

अजय के दिमाग में अब सारी बाते घूम रही थी। उसके सारे दोस्त दूर हो गए थे, पढ़ाई ख़राब हो गई थी, घर में भी पिटाई हो गई थी। इन सब की जड़ कंचें थे। उसने अब सबक ले लिया था। शाम को अजय अपने सारे कंचें लिए पार्क निकल गए। वहाँ वह राजू और रवि के पास गया और उनसे अपने बुरे बर्ताव के लिए माफ़ी मांगी। अजय ने अपने सारे कंचें राजू और रवि को दे दिए। राजू और रवि ने अजय को माफ़ कर दिया और दोस्ती का हाथ पुनः थाम लिया। इस दिन के बाद से अजय ने कभी भी कंचा नही खेला। वह फिर से मन लगाकर पढ़ाई करने लगा और पूरे उत्साह व आत्मविश्वास के साथ वार्षिक परीक्षा दी।

वार्षिक परीक्षा के परिणाम घोषित हुए। हर वर्ष की तरह इस बार भी अजय ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। अजय को पुरस्कृत किया गया। सभी अध्यापकों ने उसकी तारीफ़ की और उनके माता-पिता को भी धन्यवाद दिया। स्कूल से अजय अपने घर को लौट रहा था कि अचानक उसके पाँव के नीचे एक कंचा आ गया। उसने उस कंचें को हाथ में उठाया, उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गई थी। उसने पूरी ताकत से उस कंचें को आसमान की ओर उछाल दिया, कुछ ही सेकंड में कंचा आँखों से ओझल हो गया।…

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