शनिवार का दिन था, स्कूल की छुट्टी के बाद सभी बच्चे अपने-अपने घर को जा रहे थे। कुछ बच्चे रिक्शे से घर जा रहे थे, कुछ गाड़ी से, कुछ अपने माता-पिता के साथ निजी गाड़ियों से तो कुछ पैदल। पैदल जाने वाले दोस्तों का एक ग्रुप बन जाता है जो साथ-साथ घर जाते हैं।

रवि और ओम भी अपने दोस्तों के साथ घर जा रहे थे। दोनो एक ही इलाके के थे, तो अक्सर साथ आना-जाना लगा रहता था। दोनों की उम्र में लगभग दो वर्ष का अंतर होगा। रवि नवमी कक्षा में पढ़ता था तो वहीं ओम ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता था। इन दोनों के कुछ दोस्त कॉमन थे, इन सबको मिलाकर एक ग्रुप बन जाता था। रवि और ओम की अनबन होती रहती थी, ओम हमेशा रवि को चिढ़ाने के लिए नए-नए मुद्दे ढूंढता रहता था। क्योंकि दोनों के कुछ दोस्त कॉमन थे इसीलिए न चाहते हुए भी रवि को ओम के साथ जाना पड़ता था।

रवि एक होनहार और बुद्धिमान छात्र था जबकि ओम एक साधारण औसत छात्र था। रवि हमेशा अपनी कक्षा में अव्वल रहता था, खेलों में उसकी कोई रुचि नही थी। वही ओम का प्रदर्शन खेलो में बहुत अच्छा रहता था पर वह हर वर्ष केवल पास होने लायक अंक ही ला पाता था। ओम का पसंदीदा खेल क्रिकेट था, इसमें वो सभी का उस्ताद था।

आज रास्ते पर चलते-चलते एकदम से खेलों का मुद्दा निकल गया। खेलों के मुद्दे पर ओम को रवि का मज़ाक बनाने का मौका मिल गया। उसने रवि को चिढ़ाना शुरू किया- ” और रवि बेटा बल्ला उठाना सीखा या नही?”

इस बात पर सभी दोस्त ठहाका मारने लगे। रवि ने चुप रहना ही ठीक समझा। रवि से प्रतिक्रिया न मिलने पर कुछ सेकंड बाद ओम ने फिर बोला-” बता दो रवि भाई, अगर नही सीखा होगा तो मैं सीखा दूँगा, आखिर दोस्त हो हमारे इतना तो कर ही सकता हूँ। अब ये ठीक थोड़ी न लगता है कि हम जैसे क्रिकेट के उस्ताद का मित्र ही बल्ला चलाना नही जानता हो।”

सभी दोस्तों के हँसी के स्वर रवि के दिल को चोट पहुँचा रहे थे। इस बार रवि ने आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया-“मेरे बारे में इतना सोचने के लिए धन्यवाद पर मैं अच्छे से बल्ला चलाना जानता हूँ। मुझे तुम्हारी मदद की कोई जरूरत नहीं।”

इस आत्मविश्वास भरे उत्तर से ओम और बाकी दोस्त चकित हो गए। ओम को ऐसा लगा जैसे रवि ने उसके प्रश्न में उसे ही मात दे दी। वह उत्तेजित हो कर बोला- “अगर ऐसी ही बात है तो दो-दो हाथ हो जाए? कल इतवार का दिन है तो मिलना कल पार्क में, वही देखेंगे तुम्हारी बातें और तुम्हारा खेल। बोलो क्या कहते हो?”

रवि ने जिस हिसाब से बात कही थी उस हिसाब से उसके पास चुनौती स्वीकार करने के अलावा कोई और विकल्प नही था। अगर वह मना कर देता तो उसका एक बड़ा मज़ाक बन जाता इसीलिए उसने हाँ में उत्तर दे दिया।

“ठीक है कल सुबह आठ बजे पार्क में मिलना।”-ओम ने कहा।

“ठीक है”- रवि ने कहा।

इतवार को दोनों सुबह आठ बजे से पहले सभी दोस्तों के साथ पार्क पहुँच गए। पिच के दोनों छोर पर विकेट लगाए गए, क्रीज़ की लाइन खींची गई। तत्पश्चात अपने अनुसार नियम तय किए। पहला मैच शर्त के अनुसार रवि और ओम के बीच था, जिसके लिए एक ओवर की सीमा तय की गई। इसके बाद रवि और ओम के सामने टॉस हुआ। टॉस ओम ने जीता और पहले बल्लेबाज़ी चुनी। तत्पश्चात खेल प्रारम्भ हुआ। रवि ने पहली गेंद कराई, ओम ने ज़ोर से बल्ला घुमाया और बॉल सीधा सीमा रेखा के पार। पहली बॉल से लेकर पाँचवी बॉल तक छक्कों का सिलसिला चलता रहा, फिर अंतिम गेंद पर चार रन। ओम ने पैंतीस रन का पहाड़ सा लक्ष्य रवि के सामने रख दिया। रवि को अब ये मैच जीतने के लिए हर बॉल पर छक्के की जरूरत थी जो असंभव सा लग रहा था। रवि दवाब में आ गया। अब वह अपने से बस ऐसे खेल की उम्मीद कर रहा था जिससे उसकी इज़्ज़त बच जाए, कम से कम कुछ तो टक्कर का मैच हो। इसी दवाब के साथ बल्ला लिए रवि खेलने उतरा। ओम ने पहली गेंद कराई और बॉल सीधा जाकर विकेट में लगी। रवि शून्य पर ही बोल्ड हो गया। सभी ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। रवि को अपनी बेज़्ज़ती महसूस होने लगी, बिना किसी देरी के वो वहाँ से चुपचाप निकल गया।

इस दिन के बाद से रवि अकेला-अकेला घर जाने लगा। वह अपनी बेज़्ज़ती भुला नही पा रहा था। रवि ने मन में ठान लिया अब वह ओम को हराकर ही रहेगा। इसी उद्देश्य के लिए वह रोज शाम को पार्क जाने लगा और क्रिकेट का अभ्यास करने लगा। रोज शाम को घण्टों क्रिकेट खेलने लगा। लगभग एक महीने तक इसी तरह अभ्यास करके उसने अपना खेल काफ़ी सुधार लिया था।

अचानक एक दिन रवि इतवार की सुबह बल्ला लेकर पार्क चल दिया। पार्क में ओम और उसके दोस्त क्रिकेट खेल रहे थे। रवि ने वहाँ पहुँचकर ओम से पूछा-“क्यों ओम हो जाये एक-एक मैच?”

“क्यों नही”- ओम ने उत्तर दिया

“चलो ठीक है, सारे नियम पिछली बार जैसे ही है। आओ मैच शुरू करते हैं, जाओ पहले तुम बल्लेबाज़ी करो।”- रवि ने कहा

“जैसा तुम कहो”- ओम ने कहा

ओम बैटिंग करने उतरा। रवि ने बॉलिंग कराई। पहली,दूसरी,तीसरी…..छठी गेंद फेंकी। हर गेंद पर उम्दा बल्लेबाज़ी देखने को मिली थी पर इस बार बॉलिंग भी बेहतर हुई थी। ओम ने एक ओवर में बीस रन बना दिए। अब रवि की बारी थी। ओम ने पहली गेंद फेंकी, रवि ने बल्ला घुमाया और गेंद एक टप्पे में सीमा रेखा पार गई। रवि की चौके के साथ शुरुआत देखने के बाद ओम ने अपनी गेंदबाज़ी सुधारी और एक के बाद एक गेंद कराई। अंतिम गेंद पर ओम ने रवि को बोल्ड कर दिया जब उसका स्कोर केवल दस रन था। इस बार फिर हार के साथ रवि वहाँ से निकल गया।

इस दूसरी हार के बाद रवि ने अपना अभ्यास और बढ़ा दिया। मन मे बस एक ही धुन सवार थी कि किसी भी तरह से एक बार ओम को उसके ही खेल में हरा दें। अब वो रोज़ अभ्यास करता और इतवार के दिन ओम से मैच लगाने के लिए पहुँच जाता। हर हफ़्ते रवि को हार मिलती पर हर बार उसका प्रदर्शन पहले से बेहतर होता था। साथ-साथ ओम का भी प्रदर्शन भी बेहतर होता। इसी तरह लगभग रवि बारह-तेरह बार ओम से हार गया। क्रिकेट खेलते-खेलते रवि के मन मे क्रिकेट के प्रति लगाव बढ़ने लगा और उसकी बदले की आग कमज़ोर पड़ने लगी। इस वर्ष उसने भी स्कूल में क्रिकेट की टीम के लिए ट्रायल दिया। चूँकि उसका खेल इतने अभ्यास के बाद बेहतर हो गया था तो उसे टीम में शामिल होने में कोई दिक्कत नही आई। ओम पहले से ही उसी टीम में था। अब दोनों अपने स्कूल की एक टीम में थे।

रवि ने ओम को हारने की मंशा को छोड़ दिया, अब वह ओम से सीखने लगा। ओम भी पुरानी बातों को भुलाकर उसे दिल से क्रिकेट सिखाता था। दोनों दोस्त की तरह रहने लगे। दिन बीतते गए और प्रतियोगिता का समय आ गया। इस प्रतियोगिता में ओम अपनी टीम का कप्तान था। ओम की कप्तानी और टीम के बढ़िया प्रदर्शन की वजह से ये स्कूल फाइनल में पहुँच गया।

अब टीम केवल एक कदम दूर थी ख़िताब से। इसके लिए सभी खिलाड़ियों ने जमकर मेहनत की थी । समय पर मैच शुरू हुआ। पहले बल्लेबाज़ी दूसरी टीम की थी। इस टीम ने निर्धारित बीस ओवर में एक सौ साठ रन बनाए। अब बारी अपनी थी। ओम अपने जोड़ीदार के साथ पिच पर आया। आते ही ओम ने तूफ़ानी पारी खेलनी शुरू कर दी, छक्के, चौकों की बरसात होने लगी। अभी टीम के चालीस रन ही बने थे कि ओम का जोड़ीदार आउट हो गया। इसके बाद से एक के बाद एक विकेट गिरते रहे पर ओम एक छोर पर टिका रहा। बारह ओवर के बाद पांचवा विकेट गिरा और रवि बल्लेबाज़ी करने आया। इस वक़्त टीम के एक सौ एक रन थे, जिसमें बावन रन ओम के थे। यहाँ से टीम को साठ रनों की जरूरत थी। रवि और ओम ने सम्भलकर बल्लेबाज़ी करनी शुरू की। अभी बीस रन ही जुड़े थे कि ओम का विकेट गिर गया, इससे पूरी टीम का मनोबल गिर गया। इसके बाद रवि ने संभलकर खेलना जारी रखा, अब वह ही अंतिम बल्लेबाज़ था। पूरी टीम की नज़रे अब रवि पर थी। मैच में काफ़ी संघर्ष देखने को मिल रहा था।

उन्नीसवां ओवर ख़त्म हुआ। उन्नीसवें ओवर के बाद टीम का स्कोर एक सौ पचास था और स्ट्राइक पर रवि था। अब ग्यारह रन की दरकार थी। अंतिम ओवर शुरू हुआ। पहली गेंद पर ही रवि ने चौका जड़ दिया, पूरी टीम में खुशी की लहर दौड़ने लगी। दूसरी गेंद पर दो रन लिए गए। तीसरी गेंद पर एक रन लिया गया और स्ट्राइक पर दूसरा खिलाड़ी आ गया। अब चौथी गेंद खाली निकल गई। पांचवी गेंद पर एक रन मिल ही गया और पूरी टीम में फिर से उम्मीद जग गई। अब अंतिम गेंद बची थी और जीत के लिए तीन रन और बराबरी के लिए दो रन चाहिए थे। गेंदबाज और बल्लेबाज़ दोनों दवाब में थे। अंतिम गेंद फेंकी गई, रवि ने ज़ोर से बल्ला घुमाया और गेंद सीधा सीमा रेखा के पार, छः रनों के लिए। रवि खुशी से वही घुटने टेक कर बैठ गया। ओम दौड़ा हुआ आया और रवि को अपने कंधे पर उठा लिया।

दोनों की आँखों मे खुशी के आँसू थे। “आज तुमने न सिर्फ़ मैच जीतवाया है बल्कि मेरा दिल भी जीत लिया। तुम ही मेरी नज़रों में इस मैच के विजेता हो।”-ओम ने कहा।

“मैं तो बस आपका शिष्य हूँ, सब आपसे ही सीखा है।”-भरी हुई आवाज़ में रवि ने कहा।

इसके बाद विजेता टीम को मंच पर सम्मान के लिए बुलाया गया। विजेता टीम को ट्रॉफी और इनामी राशि प्रदान की गई। इसके बाद ओम को सर्वाधिक रनों के लिए ‘मैन ऑफ द मैच’ का ख़िताब दिया गया। इस ख़िताब को ओम ने रवि को पकड़ा दिया और कहा-” इसके असली हक़दार तुम हो।”

“नहीं-नहीं”- रवि ने कहा।

“नही, ये ‘मैन ऑफ द मैच’ की इनामी राशि मेरी तरफ़ से तुम्हारे लिए, मना मत करना।”- ओम ने कहा।

रवि और ओम दोनों की आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे।…

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