दसवी कक्षा में राजू नाम का एक विद्यार्थी पढता था, वह अपनी कक्षा का सबसे होशियार व होनहार छात्र था। यही कारण था कि सभी अध्यापक तथा अध्यापिका उसे अपना प्रिय छात्र मानते थे। उसके कक्षा-अध्यापक के लिए भी वही सबसे प्रिय छात्र था। राजू को भी अपने कक्षा-अध्यापक ही सबसे प्रिय लगते थे। राजू हमेशा सभी अनुशासन के नियमो  का पालन करता व अध्यापक की कही हुई हर बात मानता था, वह सदैव अपने अध्यापको का आदर करता था। राजू हमेशा से ही अपनी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करता था। यही सारे गुण राजू को एक आदर्श विद्यार्थी बनाते थे। राजू एक मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता था और वह बड़ा होकर अध्यापक बनना चाहता था। राजू का एक सहपाठी था रमेश। रमेश अपनी कक्षा का शरारती बच्चा था और वो अपनी पढाई में बिल्कुल भी ध्यान नही देता था।

आये दिन रमेश की कोई न कोई शरारत सामने आती रहती थी। इस कारण रमेश रोज ही अपने शिक्षको से डाँट खाता था। परन्तु इसके बावजूद रमेश के कक्षा-अध्यापक हमेशा रमेश को प्यार से समझाते।  रमेश वैसे तो किसी भी शिक्षक की कोई बात नही मानता था परंतु अपने कक्षा-अध्यापक की बात मान जरूर रखता था, क्योंकि उसको भी अपने कक्षा-अध्यापक प्रिय थे। रमेश के पिता एक बहुत बड़े व्यापारी थे और उनके पास धन दौलत की कोई कमी नही थी। रमेश अपने पिता की इकलौती संतान था और बड़े होकर उसे उन्ही का व्यापार संभालना था। यही कारण था कि रमेश बचपन से शरारती था और पढाई में ध्यान नही देता था। इस बार भी दसवी कक्षा में राजू हर बार की तरह पढाई व अन्य कार्य  कर रहा था। धीरे-धीरे कुछ महीने बीते और प्रथम सत्र की परीक्षा आ गयी।

सभी विद्यार्थियों ने इस बार भी अपनी मेहनत से परीक्षा दी। राजू ने भी अपनी पूरी मेहनत के साथ परीक्षा दी। कुछ ही दिनों में परीक्षा का परिणाम आ गया। फिर सभी विद्यार्थियो को कक्षा में उनके अध्यापक ने एक-एक करके बुलाया और उन्हें उनके परिणाम बताये और उन्हें उनके प्रदर्शन के बारे में बताया। ऐसे ही राजू को भी अध्यापक ने परिणाम बताया। राजू इस बार भी कक्षा में प्रथम आया था। अध्यापक ने उसके लिए कक्षा में तालियां बजवाई फिर उसे अपना आशीष दिया और फिर उसे और बेहतर करने को कहा और उसकी कुछ गलतियो से भी उसे  रुबरु करवाया। फिर रमेश को भी अध्यापक ने उसका परिणाम बताया। इस बार रमेश पर अपने अध्यापक की बातो का असर हुआ था और उसने हर बार से काफी अधिक अंक प्राप्त किए थे। हर बार रमेश मुश्किल से ही उत्तीर्ण हो पाता था परन्तु इस बार रमेश ने साठ प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त किए थे। इसीलिए अध्यापक ने उसके लिए भी कक्षा में तालियां बजवाई। इसके बाद अध्यापक ने रमेश की जमकर तारीफ की और बाकी विद्यार्थियो को भी प्रेरणा लेकर अपना परिणाम सुधारने को कहा। अध्यापक ने फिर बाकी विद्यार्थियो को भी उनके परिणाम से रूबरू करवाया।

इस दिन भी राजू हर बार की तरह खुश था परन्तु मन में एक ही सवाल बार बार खटक रहा था कि मैंने बहुत मेहनत की थी और अपनी कक्षा में प्रथम आया और जबकि रमेश केवल साठ प्रतिशत अंक लाया फिर भी अध्यापक ने रमेश की अधिक तारीफ की।  क्योकि राजू अपने कक्षा अध्यापक को बहुत मानता था इसीलिए उसने कुछ देर सोचा फिर अपने आप से कहा कि जरूर कोई कमी छूट गयी होगी जभी अध्यापक ने ऐसा किया। इसके बाद फिर से पढाई शुरू हो गई। इस बार राजू पहले से भी अधिक मेहनत करने लगा। अब रमेश  भी  ढंग से पढ़ने लगा ।

इसका कारण यह था कि उसकी तारीफ पहली बार किसी अध्यापक ने की थी और इसका सकारात्मक प्रभाव उसकी पढाई पर भी पड़ा। धीरे-धीरे दिन बीते और द्वितीय सत्र की परीक्षा आ गयी। इस बार फिर से सभी विद्यार्थियो ने पूरी मेहनत के साथ परीक्षा दी। कुछ ही दिनों में इस परीक्षा का परिणाम भी आ गया। इस बार भी पिछली बार की भाँति अध्यापक ने एक-एक करके सभी विद्यार्थियों को परिणाम सौपे। इस बार भी राजू कक्षा में प्रथम आया था और अध्यापक ने इस बार भी कक्षा में उसकी तारीफ की और फिर उसे और बेहतर प्रदर्शन करने को कहा। इसबार रमेश ने पिछली बार की तरह ही बेहतर प्रदर्शन किया और इसबार रमेश ने पैंसठ प्रतिशत अंक हासिल किए थे। इसबार भी अध्यापक ने जमकर तारीफ की और पूरी कक्षा को रमेश से प्रेरणा लेने को कहा। आज के दिन की बात से राजू के मन को फिर ठेस पहुँची। इस बार राजू को अपने अध्यापक की बातो का बुरा लगा। अब राजू को रमेश से जलन होने लगी। इस दिन के बाद राजू के व्यवहार में अंतर आने लगा। राजू की पढाई का स्तर दिनों दिन गिरने लगा। अध्यापक ने कुछ ही दिनों में यह बात गौर कर ली।

अध्यापक ने राजू को उसका प्रदर्शन सुधारने को कहा। फिर भी राजू को कुछ फर्क नही पड़ा। फिर अध्यापक ने एक दिन राजू को छुट्टी के वक़्त मिलने को कहा। राजू उस दिन फिर छुट्टी के वक्त अपने अध्यापक से मिलने गया। अध्यापक ने उससे उसके बदले स्वाभाव के बारे में पूछा। राजू ने कहा कि उसे कोई परेशानी नही है। फिर अध्यापक ने कई बार राजू से पूछा कि किस वजह से तुम पढाई में पिछड़ रहे हो। काफी देर बाद बहुत पूछने पर  राजू ने अध्यापक को सारी बात बता दी। उसने कहा कि रमेश के इतने कम अंक पर भी आपने मुझसे अधिक उसकी तारीफ कर दी। इतनी बात सुनकर अध्यापक को सारी बात समझ आ गयी। उसने आज राजू को अपने साथ घर चलने को कहा।  फिर चलते-चलते शिक्षक ने उसके प्रश्न का उत्तर देना शुरू किया। अध्यापक ने पूछा,” तुम्हारा उद्देश्य क्या है?”  राजू ने कहा , “मुझे अध्यापक बनना है।”  अध्यापक ने फिर कहा, “बताओ रमेश को बड़ा होकर क्या करना है?” तब राजू ने उत्तर दिया, “व्यापारी बनना।” उसके बाद अध्यापक ने राजू को समझाया, उन्होंने कहा कि रमेश हमेशा से बड़ी मुश्किल से उत्तीर्ण होता था। परन्तु इस बार उसने सुधार किया और काफी अधिक अंक प्राप्त किए और उसे केवल उत्तीर्ण होना था, क्योंकि उसका मानना यह था कि ये पढाई उसके काम के लिए  जरुरी नही है। तभी राजू बोल पड़ा ,”जभी आपने उसे प्रोत्साहित किया ताकि वो अपनी पढाई जारी रखे और उसका प्रदर्शन सुधरे।” पर अभी भी उसके मन में एक प्रश्न था और अध्यापक ने उस प्रश्न को भाँप लिया था। फिर अध्यापक ने उसके उस प्रश्न का उत्तर दिया जो अभी वह पूछने वाला था।

अध्यापक ने कहा कि हमेशा मै तुम्हे केवल इसीलिए तुम्हे तुम्हारी छोटी-छोटी गलती बताता था क्योंकि मै चाहता था कि तुम अपनी गलतियो को सुधारो और तुम्हारा प्रदर्शन बेहतर हो जाये। अध्यापक ने कहा, तुम मेरे प्रिय छात्र थे इसीलिए मै तुम्हे हमेशा छोटी छोटी बातो पर टोकता रहा। फिर अध्यापक ने राजू को कुम्हार और घड़े का उदाहरण दिया। कुम्हार अपने घड़े को एक तरफ हाथ लगाकर आराम से रखता है ,वही दूसरे हाथ से उसे पीटता है। इसी से घड़े को उसका आकार व मजबूती मिलती है। यह सब बाते सुनकर छात्र भावुक हो गया और अब उसे अपने सभी प्रश्नो के उत्तर मिल गए थे। राजू को सब समझ आ चुका  था।

राजू को अपनी गलती का अहसास हो चुका था। राजू ने अपने अध्यापक को ध्यनवाद कहा और माफ़ी भी मांगी। अध्यापक ने उसके सिर पर अपना हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और मेहनत से पढाई करने को कहा। राजू ने सर हिलाकर हामी भर दी। उसके बाद राजू ने मन लगाकर दुगनी उत्साह के साथ मेहनत की और दसवी की बोर्ड की परीक्षा में पूरे विद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया। सभी अध्यापको ने उसे बधाई व पुरुस्कार दिए। राजू ने अपने कक्षा-अध्यापक को आकर ध्यनवाद कहा और उनसे आशीर्वाद लिया। राजू जनता था आज जो भी उसने किया है उसके पीछे केवल उसके कक्षा -अध्यापक ही है।

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