आज भी यश एक साधारण सा बच्चा, उम्र तकरीबन बारह वर्ष की होगी, रिक्शे से विद्यालय जा रहा है। मन ही मन बहुत खुश है, यह ख़ुशी उसके चेहरे पर साफ़ झलक रही है। यश अपने बैग को बार-बार खोलता है, उसके अंदर कुछ झाँकता है और फिर हाथ से किसी वस्तु को निहारता है। फिर बार-बार अपने बाँये हाथ की कलाई को भी देखता और खुश हो जाता।

उसके हाथ पर एक सुंदर सी घड़ी देखी जा सकती थी, घड़ी बड़ी ही चमकदार और सुंदर थी, कोई भी देखकर अंदाज़ा लगा सकता था कि यह घड़ी बिल्कुल नई है। सूरज की रोशनी में घड़ी का शीशा चमक रहा था। उसके चेहरे से आराम से समझा जा सकता है कि वह मन ही मन न जाने किस दुनिया में खो गया है। शायद उसकी ख़ुशी का कारण उसकी नई घड़ी थी और कुछ और भी, जो उसने बैग में रख रखा था। वो इन ख्यालो में था कि एकदम से उसका रिक्शा रुका और वो वर्तमान में वापिस आ गया, सामने देखा तो विद्यालय आ चुका था। यश यूँ तो साधारण सा बच्चा था पर अगर उसकी कोई कमी बताई जाये तो वह था उसका घमंड। यश घमण्डी था और अपने हर सामान पर इतराता रहता था। यही कारण था कि उसके बहुत कम ही दोस्त थे और कोई अन्य बच्चा उससे जल्दी बात नही करना चाहता था।

ऐसा ही कुछ आज भी हुआ। आज यश बड़ी ही तेज़ी से विद्यालय के अंदर गया और अपनी कक्षा में जाकर बैठा। जल्दी से उसने अपने तीन दोस्तों राजेश, राजू और रवि को अपने पास बुलाया और फिर अपनी घड़ी उन्हें दिखाने लगा। उसकी घड़ी देखकर उनका भी मुँह खुला का खुला रह गया, घड़ी यश के हाथ पर बहुत फब रही थी, घड़ी वाकई बहुत सुंदर और अच्छी थी। राजेश ने कहा,”कहाँ से लाया यह घड़ी”, रवि ने कहा,”कितने की यह घड़ी”, राजू कहने लगा,”एक बार मुझे दिखायेगा अपनी ये घड़ी”। इतना सुनते ही यश ने अपना हाथ झट से हटा लिया और कहा,” नही- नही, मेरी घड़ी को कोई हाथ भी मत लगाना, यह घड़ी मेरे चाचा मेरे लिए शहर से लाये है, बहुत महंगी घड़ी है, तुम्हारे बस की नही है यह खरीदने की। जब तक यह घटना घटित हुई तब तक कुछ बच्चे और भी उसके पास आ गए और उसकी घड़ी देखने लगे।

आखिर देखते भी क्यों नही, थे तो छोटे बच्चे ही और नई-नई चीज़े देखकर किसको जिज्ञासा नही होती, किसको शौक नही होता। इसीलये यश के पास भी बच्चों का जमावड़ा लग गया। इसके बाद यश ने बैग से एक सुंदर सी चित्रकला की किताब निकाली, शायद रास्ते में यश बार-बार अपने बैग में यही देख रहा था। आखिर उसे भी अपनी ये किताब सबको दिखाने की जल्दी थी। अपनी किताब निकाल कर अब वह ये सबको दिखाने लगे। किताब के मुख्य पृष्ठ से किताब काफी अच्छी लग रही थी, एक मनमोहक सा दृश्य मुख्य पृष्ठ था। उसके बाद यश ने अपनी किताब खोली और पृष्ठ बदलने लगा।

हर पृष्ठ पर एक नया शानदार और मनमोहक चित्र था, किसी पर प्रकृति का चित्र था तो किसी पर कार्टून का और किसी पर कुछ का,अबतक तो लगभग पूरी कक्षा यश के चारो तरफ खड़ा हो गयी। यह सब देखकर तो जैसे यश को और ख़ुशी मिल गयी। चारो तरफ से तरह-तरह की आवाज़े सुनाई दे रही थी। कोई कह रहा था, “यह वाला चित्र सबसे बढ़िया है तो कोई कह रहा है वापिस वही चित्र दिखा और भी न जाने क्या-क्या……।” यह सब सुनकर यश के भाव बढ़ रहे थे और अपने आप को अब वो सबसे अलग और श्रेष्ठ समझ रहा था। धीरे-धीरे एक-एक करके उसने सारे पृष्ठ पलट दिए और फिर किताब बन्द कर दी। तभी एक तरफ से एक बच्चे की आवाज़ आई,”एक बार फिर से।” यश कहने लगा,” तुम्हारे लिए मेरे पास फालतू वक्त नही है जो बार-बार तुम्हे अपनी किताब दिखाऊँ, एक बार फ़ोकट में क्या दिखा दी तुम सब तो सर पर ही चढ़ गए।” अब दूसरी ओर से एक आवाज़ आई,” कहाँ से तुम ये किताब लाये और कितने में?”

यह सुनकर यश हँसते हँसते बोला,” यह तुम्हारे बस की बात नही है, यह ऐसी कोई किताब नही है जो किसी भी ऐरे-गैरे नत्थू खैरे के पास मिल जायेगी, ये तो मेरे चाचा सिर्फ मेरे लिए शहर से लाये है और इसकी कीमत पाँच सौ रूपये है, जानते भी हो कितनी बड़ी रकम होती है पाँच सौ रूपये, चलो हटो।” इन सब बातो में दस-बीस मिनट बीत गए और जभी घण्टी बजी, सभी मैदान की तरफ प्रार्थना के लिए चले गए। यश ने भी अपनी किताब बैग में रखी और प्रार्थना के लिए निकल गया। प्रार्थना के बाद सभी बच्चे कक्षा में वापिस आये और साथ ही साथ अध्यापक भी आये। अध्यापक ने पढ़ाना शुरू कर दिया पर आज यश का मन बिल्कुल भी पढाई में नही था, वह सिर्फ अपने बैग में बार-बार देखता तो कभी-कभी अपनी नई घड़ी को। दो घण्टे बाद घण्टी बजी और सब बच्चे अपना-अपना टिफिन लेकर निकल पड़े। वैसे तो यश रोज इस वक्त कक्षा में नही रहता था पर आज वो बाहर नही गया, लेकिन वह दो मिनट के लिए बाहर जरूर गया था। इस दो मिनट में उसके दोस्त रवि ने किताब यश के बैग से निकाल ली और देखने लगा। इस किताब ने तो हर बच्चे का मन मोह लिया था, इसीलिए रवि का किताब निकालना कोई खास बात नही होगी। यश के वापस लौटते ही रवि ने झट से किताब वापिस उसके बैग में रख दी पर ऐसा करते हुए यश ने उसे देख लिया था और यश ने आते ही रवि को एक चाँटा जड़ दिया।

अब रवि के पास कहने के लिए कोई शब्द नही था और चुपचाप वो जाकर अपने बेंच पर बैठ गया। आज की इस घटना से रवि और यश की दोस्ती भी टूट गयी। अब यश के कक्षा में केवल एक या दो ही मित्र रह गए थे और उनसे भी यश की कभी-कभी ही बात होती  थी। रवि ने यश से बात करना छोड़ दिया था। काफी दिन ऐसे ही बीत गए। एक दिन शाम को यश रोज की तरह आज भी अकेला अपनी साईकिल मैदान में दौड़ा रहा था, आसपास सभी बच्चे खेल रहे थे, उनमे से अधिकतर उसकी कक्षा के ही बच्चे थे।

आज यश अपनी साईकिल अँधाधुंध चला रहा था तभी अचानक एक बड़े से पत्थर  से उसकी साईकिल टकराई  और  वह बुरी तरह जख्मी हो गया। यश मदद के लिए चिल्लाने लगा पर कोई न आया, यश के बर्ताव का फल आज उसे मिल रहा था। संयोग से रवि वहीँ से गुज़र रहा था, उसने यश को ऐसी हालत में देखा तो उसके मदद के लिए दौड़ पड़ा, अपने साथ अपने कुछ दोस्तों को बुला लाया और यश को उठाया।

यश के सर से बहुत खून निकल रहा था और उसके पैरो में भी काफी चोटे आई थी। रवि ने पहले अपना रुमाल उसके सर पर बांध दिया और फिर अपने दोस्तों की मदद से उसे उसके घर तक छोड़ कर आया। आज यश को अपनी गलतियों का अहसास हो रहा था और आज की इस घटना ने उसकी आँखे खोल दी थी। अगर आज रवि उसकी मदद न करता तो न जाने उसके साथ क्या होता। आज वो रवि से माफ़ी मांगने लगा, रवि ने भी अच्छे दोस्त के नाते उसे माफ़ कर दिया। आज उन दोनों की दोस्ती फिर कायम हो गयी। यश ने अपनी चित्रकला की किताब रवि को भेंट कर दी। इस दिन के बाद से यश का व्यवहार बिल्कुल बदल गया। अब वो सुधर चुका था और सबकी भांति अब उसके भी कई दोस्त थे। एक दिन की घटना ने उसका घमण्ड दूर कर दिया था, उसे  उसके कई दोस्तों से मिलवा दिया था।

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