जानता हूं मैं

कि जानती है वो मुझसे बेहतर

कैसी मोहब्बत चाहिये मुझे आखिरकर

यूं खुल के कभी कहा नहीँ उससे

पर आज उसकी नज़रों ने

कुछ ऐसी क़यामत बरपायी कि

पूरे कपड़ों में आज मुझे वो

‘दैहिक-आनंद’ की साक्षात प्रतिमा नजर आयीं

अपनी निगाहों की बेसब्र उंगलियों से

उसकी हर वक्रता को टटोलता

उस, ‘सरक-फांस’

ढीली गांठ की तलाश में हूं

एक झटके से जिसे खोलकर

उकसा सकूं उसे इतना कि

अपनी वर्जनाओं से विद्रोह कर

खुद ही उपलब्ध करा दे मुझको

एक निर्भ्रांत, निश्चिंत, निर्वसन ‘निर्वाण’

अपनी विकलता को और कैसे

परिभाषित करुं,

सूझता नहीं कोई और ‘पर्याय’

बड़ी खूबसूरत लगती है ‘कम्बख़्त’

जब भी वो साड़ी पहनती है

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