कुर्सी पर बैठा विपिन आज कुछ सोचे जा रहा था, पता नहीं क्या था जो उसे मन ही मन बेचैन किये जा रहा था| पहले लगा की माँ से बात नहीं की फोन पर आज, यही बेचैनी की वजह होगी शायद| माँ को फोन लगाया| माँ से बात समाप्‍त की, तो कुछ अच्‍छा लगा|

बातें तो सिर्फ बहाना होती हैं, माँ के वो प्रश्न -बेटा खाना खाया ? खाने में क्या था ? मन तो लग रहा है न वहां ? सुनने के दौरान उनकी मधुर आवाज जो दूरभाष के माध्यम से शहरों की दूरियों को लांघकर कानों तक पहुचती थी, तो मन से थकान मानो इस कदर उतर जाती जैसे मिट्टी से सने शिशु के शारीर से मिट्टी पानी के पहले प्रवाह से|

थकान तो चली गयी पर मन था कि अभी भी बैचेन हुए जा रहा था, ना जाने क्यों ? ख्याल आया की आज मेस में भठूरे थोड़े कच्‍चे सिके थे और हाजमा दो दिन से खराब है, तो कहीं इसी वजह से तो परेशानी नहीं ? पर विपिन भी भलीभांति जानता था कि ये सब तो अपने आप को दिलासा देते रहने और दिल को ‘ऑल इन वेल’ बोलकर बहकाए रखने वाली बातें हैं |

उसे अचानक याद आया कि महाविद्यालय में दाखिला लेने के पश्चात आज पहली बार ऐसा हुआ है जब माँ ने स्वयं फोन नहीं किया, वरन उसे फोन करना पड़ा| माँ की आवाज में एक ऐसा उत्साह होता था, जो हमेशा उन्हें सुनते रहने की इच्छा जाग्रत करता था, फोन रखने की अनुमति नहीं देता था, उस उत्साह का अभाव आज उनकी बातो में था| फिर माँ को पता भी तो है, कितना मासूम दिल है उनके विपिन का| थोडा सा अशुभ का एहसास होते ही टूट जाता है| याद होंगे माँ को वे दिन जब पापा शाम को ऑफिस से घर आते वक्त अगर फोन नहीं उठा पाते, तो कैसे चिंता में बेहाल विपिन अपनी साईकिल लेकर बस स्टैंड पहुंच जाता और बस से उतरते अपने पिता को देख इस कदर उसे चैन मिलता मानो जिन्दगी से हार चुके व्यक्ति के ह्रदय में जिजीविषा का संचार हो गया  हो|

ज्यादा बड़ा नहीं है विपिन का परिवार|  माँ गृहिणी है जो थोडा गुस्सा करने वाली है, पर विपिन को बड़ा लाड करती है| विपिन भी अपनी माँ का खुब आदर करता है| कभी उम्र के आवेश में माँ को कुछ बोल भी देता, तो मन ही मन स्वयं को खूब कोसता, पर बिना गलती के माफी मांगता नहीं था| परंतु जब माँ उसकी किसी बात को दिल से लगा लेती और दरवाजा बंद करके बैठ जाती तो अपनी बातों से पूर्णतः संतुष्‍ट होने के बाबजूद विपिन अपना हठ छोड़ देता और एक मासूम की भांति दरवाजे को पीटने लगता, फिर भी जब माँ दरवाजा नहीं खोलती, तो बहन से बोलता की तू माँ को बोल दे की भैया ने भी अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया है अब माँ का हठ ममता का सामना कब तक कर सकता था, आखिर विजय तो ममता की ही होनी थी, बस समय का खेल था| उसी क्षण माँ दरवाजा खोल देती और विपिन को थोडा डांटकर,थोडा समझा कर जो ममत्व का स्पर्श प्रदान करती, उसके लिए तो हजारों जन्नतें भी कुर्बान हो जायें, तो भी विपिन को कोई गम नहीं|

विपिन के पिता थोड़े पुराने विचारों वाले हैं| अपने जीवन में २१ वर्ष लगातार अध्यापन कार्य में संलग्न रहने के बाद अब वे सरकारी दफ्तर में लेखाकार के पद पर कार्य करते हैं| अपनी संतान की उपलव्धियों पर गर्व करने का गुण पितृवर्ग में मातृवर्ग की अपेक्षा कहीं अधिक पाया जाता है| जहाँ महिलायें अपनी वार्ता का अधिकांश भाग इधर उधर की बातें करने में व्यतीत कर देती हैं, उसी वार्ताकाल में पिता अपने नौनिहालों की उपलब्धियों का वर्णन कर उनमें अपने अमूल्य योगदान की झलक देखने का प्रयास करते हैं|

विपिन बचपन से ही मेधावी छात्र रहा है l दशम कक्षा तक शहर, विद्यालय या संभाग स्तर पर आयोजित होने वाली लगभग सभी कक्षाओं में प्रथम आता था l उसकी इन्हीं सफलताओं से गुप्ता जी स्वयं को इतना जोड़ चुके थे कि जब वह IIT  में दाखिले के लिए लगने वाली परीक्षा अच्छे अंकों से पास नहीं कर पाया, तो उन्हें लगा की विपिन अपना आत्मविश्वास खोता जा रहा है l वही आत्मविश्वास, जो उसे किसी भी परीक्षा में बैठने से पूर्व ही सफलता मिलने का अंदेशा करा देता था, वह कहीं गायब सा दिखने लगा था|

इसी अवधि में विपिन और उसके पिता के विचारों में विरोधाभास भी आने लगे l विपिन को लगता था की यह असफलता शायद उसके जीवन में आई एक छोटी सी बाधा ही तो है, जो भले ही रथ की गति को धीमा कर दे, पर रथ को थोड़े ही तोड़ देगी|

अब वह पिता के सामने प्रश्न रखता है कि क्या ऐसे व्यक्ति हैं, जो समाज में सिर्फ इसलिए जाने गये या इतिहास में इसलिए याद किये गये क्योंकि उन्होंने फलां इम्तिहान पास किया फिर भी उसकी इच्छा थी की वह दोबारा इम्तिहान दे क्योंकि ना तो अभी उम्र अधिक हुई थी और काबिलियत तो थी ही ………. शायद|

यह ‘शायद’ ही था जिसके कारण वह अपने पिता को विश्वास नहीं दिला सका कि वह अवश्य सफल होगा l माँ बाप को भी इतनी समझ थी, कि परिणाम सिर्फ मेह्नत से नहीं मिलते, कुछ किस्मत का भी सहारा चाहिए होता है, पर उन्हें विश्वास था अपने बेटे की काबिलियत पर, कि अगर विपिन एक बार पूरे आत्म विश्वास से हां बोल दे तो बद्किस्मती के अलावा कुछ और उसे सफलता अर्जित करने से रोक नही सकता l खैर, ना तो वह ‘हां’   विपिन बोल सका और न ही माँ बाप उस ‘शायद’ को समझ सकेl अभी विपिन मालवीय राष्ट्रीय प्रोद्योगिकी संस्थान में अध्यनरत है|

उसी महविद्यालय के छात्रावास में अपने कक्ष में बैठा विपिन इन्हीं यादों की बैचेनी में  खोया जा रहा था, तो उसने सोचा की क्यों न एक बार फिर घर पर बात करूं और पूछूं कि सब खैरियत तो है ना| जानता तो था कि कच्चे दिल वाले विपिन को कोई भी अशुभ खबर फोन पर नहीं देगा, पर स्वयं पर विश्वास था कि माँ की आवाज में सूक्ष्मतम परिवर्तन को भी सरलता से भांप लेगा वह l उसने माँ को फोन लगाया, तो जैसी ही घंटी बजना प्रारम्भ हुई, ईश्वर से सब खेरियत की प्रार्थना करता वह फोन उठने का इन्तजार करने लगा l एक के बाद एक करके घंटी बजना समाप्त हो गया पर कोई उत्तर नहीं था l अब तो चिंता का बढना भी लाजमी था l दो तीन बार और प्रयास किया , परन्तु परिणाम वही था l उसने अपनी कांटेक्ट लिस्ट को खंगालना प्रारंभ किया ,  तो उसे पडोस वाले सिंघल अंकल का फोन न. दिखाई दिया l फोन लगाया , पर घंटी जाना प्रारंभ हो उससे पहले ही विपिन ने फोन काट दिया l रात के 9.30 बजे थे l इस तरह किसी को परेशान करना भी तो उचित नहीं है, पर दिल ने किसी भी कायदे को स्वीकार करने से मना कर दिया l चिन्ता ने कायदे की सीमायें लांघी और दो तीन घंटियों के बाद ही किस्मत से सिंघल जी ने फोन उठा लिया वैसे भी सिंघल जी व्यापारी थे और व्यापारियों की जीवन चर्या में शयन को कोई  आरक्षण नहीं होता l बड़े सलीके से विपिन बोला ,

“अंकल! में विपिन बोल रहा हूं, इतनी देर से फोन करने की वजह से आपको डिस्टर्ब हुआ होगा “आई एम् रीयली सॉरी फॉर देट ” अंकल आज घर पर कोई फोन नहीं उठा रहा है पहले ऐसा कभी नहीं हुआ आप एक बार घर जाकर बोल दें कि वे मुझे कॉल कर लें”|

सिंघल जी ने बड़े धैर्य से उसकी बातें सुनी और कहा कि “बेटा! चिंता नही करो ,फोन कहीं रखकर भूल गये होंगें| अभी तुम्हें काल कर लेंगे| मैं तुम्हारी बात करा देता पर मैं अभी यहाँ गाँव आया हुआ हूँ ”|

विपिन को याद आया की सप्ताह के अंत में व्यापारिक कार्य से सिंघल साहब गाँव जाते थे, पर उनकी बातों से एक विश्वास जगा, जो मानो कह रहा था कि चिंता मत कर, सब कुछ अछ्हा ही होगा| अब तो मोबाइल में किसी परिचित का नंबर भी नहीं था चिंता कम हुई पर समाप्त नही हुई| अब उसने पुन: घर का न. डायल किया , परंतु आशा के विपरीत इस बार मां की मधुर आवाज का आवरण धारण किये ‘हेलो’ शब्द उसके कानों तक पंहुचा तो ऐसा लगा मानो निराशा की तेज गर्मी में सकून की बेमौसम वर्षा हो गयी हो|

विपिन – हेलो !

माँ – हां बेटा! कैसे फोन किया?

विपिन –ऐसे ही! खैर, फोन क्यूं नहीं उठाया ?

माँ – मैं तो बाहर बैठी हुई थी और पापा  TV  देख्र रहे थे तो शायद आवाज सुनाई नहीं दी  होगी l

अब विपिन को समझते देर ना लगी कि माँ कुछ न कुछ छिपा रही है, पर उसकी सीधे बोलने की हिम्मत नहीं थी l वह भी अशुभ सत्य की परिकल्पना से भयभीत था l

विपिन – माँ ! पापा से बात कराओ l

माँ – पापा सो गये हैं, सुबह बात करा दूंगी l

विपिन ने जैसे तैसे करके हिम्मत बटोर कर डर पर काबू पाने का प्रयास किया और माँ से बोला कि माँ! तुम कुछ छिपा रही हो, मुझे चिंता हो रही है l

माँ ने विपिन की स्थिति को भांपा ओेर बोली, “बेटा! तू चिंता क्यों करने लगता है इतना जल्दी? तू जैसा सोच रहा है, वैसा कुछ नहीं  है| आज स्कूल से जब गुडिया घर आ रही थी, तो मोटर साईकिल से एक्सीडेंट हो गया उसके बायें पैर में फ्रेक्‍चर हो गया है| अब उसकी दसवीं की परीक्षा है| डॉक्टर ने बोला है कि अब वो एक महीने तक स्कूल नहीं जा सकती है l अब परीक्षा भी तो आने वाली हैं, पता नहीं कैसे संभाल पाएगी?”

“और माँ! तुम मुझे अब बता रही हो, वह भी तब जब इतना पुछा मैंने| पता है ना कि मैं कितना प्यार करता हूँ अपनी बहन से मैं, उसे बोल नहीं पाता तो तुम को भी पता नहीं चला? अब कैसी है वो? कोई खतरा तो नहीं है ? जल्दी रिकवर कर लेगी? जयपुर इलाज करवायें? परेशान विपिन अपनी तरफ से हर संभव मदद प्रस्तुत किये जा रहा था, जो प्रश्नों के रूप में अपनी बहन के प्रति उसके प्यार की बौछार जैसी बरस रही थी|”

“तेरी इसी चिंता की वजह से ही तुझे कुछ नहीं बताया तुझे कुछ बताती तो तू तुरंत घर आने के लिए निकल पड़ता l फिर तू तो अपने मन से क्या क्या सोच लेता है l अब ऐसे में यदि तुझे बताती की तेरी बहन का एक्सीडेंट हो गया है, तो चिंता में तू परेशांन  हो जाता l तू पढाई पर ध्यान दे बेटा” माँ ने समझाया, “उसे प्लास्टर चढ़ा है , आराम के लिए बोला है डॉक्‍टर ने| ”

अंत में विपिन बोला कि ठीक है माँ! अपना ख्याल रखना| गुडिया का भी ध्यान रखना क्यूंकि वो बेचारी तो सबका भला सोचती है सदा|

विपिन की इस बात पर माँ जरूर रो पढ़ी होगी, क्यूंकि शब्दों के भार में पीड़ा दब सकती थी, पर दफ़न नही हो सकती थीl इससे पहले की माँ का रुदन विपिन के कानो में पड़ता , माँ ने फोन रख दिया l

विपिन और उसकी बहन का रिश्ता भी एक अलग प्रकार का है l बहन विपिन में उम्र में बहुत छोटी है, तो भाई बहन वाली वह चुलबुलाहट तो नहीं है उनके रिश्ते में , परन्तु कायदे की सीमा ने प्रेम के प्रवाह में बाधा नहीं आने दी l बहुत लाडली है विपिन को अपनी बहन गुडिया l स्वभाव से शांत व गंभीर तथा दिल से बिल्कुल पाक मानो उसे इस धरती पर दुसरों के दु:खों में भागीदार बनने ही भेजा गया है l रिश्तों के प्रति उसकी संवेदनशीलता विपिन से भी कहीं ज्यादा है अपने भाई की खुशी  के लिए अपनी पसंदीदा चीजों का त्याग करने में संकोच नहीं करती वह| उसकी पर सेवा और दया की भावना से कभी कभी विपिन सोचता कि कैसे गुडिया इस संसार में अपना अस्तित्व तलाश पायेगी, जहां प्रतिदिन छद्म और ईर्ष्या, नेकी और ईमानदारी को मात देते नजर आते हैं l खैर, विपिन सोचता कि ऐसे सरल लोगों की देखरेख फिर ईश्‍वर खुद करता है|

लगभग एक महीने बाद

समय बीतता गया विपिन की परिक्षाएं समाप्त हुई और घर जाने की तैयारी शुरू हुई lख़ुशी का तो स्तर वही रहा होगा जो सभी अभियान्त्रिकी छात्रों का हुआ करता है l विपिन स्टेशन पहुंचा, तो गाडी देर से थी, तो विपिन ने सोचा कि क्यूं न गुडिया के लिये कुछ खरीद लूं l उसे पता था की सदैव साधारण पहनावा धारण करने वाली गुडिया को कुछ पसंद था तो वह थी भूरे रंग की बह बकल जो माँ ने उसे जन्म दिवस पर भेंट की थी l अब वही बकल मिलना तो संभव नहीं था परन्तु भूरे रंग की बकल उसे पास एक ठेले पर मिल गयी उसने पचास रूपये अदा करके वह बकल खरीद ली l

गाड़ी के आने की घोषणा हुई तो विपिन अपना सामान लेकर गाडी में चढ़ा l समय से रेस लगाती ट्रेन सरपट दौड़ी जा रही थी, तो पीछे छूटते पेड़ ऐसे लग रहे थे मानो किसी यात्री को उसके प्रियजन अलविदा कहने आये हों l

गाडी जंक्‍शन पर रुकी l स्टेशन पर बहुत भीड़ थी l विपिन को सदैव सरप्राइज देना अच्छा लगता था , अत: वह घर पर बिना बताये ही आया था, परन्तु उसे खबर नहीं थी कि, घर पर जो सरप्राइज उसका इन्तजार कर रहा है वह उसके दिल को अंदर तक भेद देने वाला है l

घर पर पहुंचते ही उसने माँ को आवाज लगाईl माँ को देखते ही अपने संस्कारों का पूर्ण परिचय देते हुए श्रद्धा पूर्वक नमन किया, चरण स्पर्श किया l जैसे ही वह नीचे झुका उसे अपने सर पर पानी की बूँद गिरने का एहसास हुआ l उस बूँद ने उसकी आँखों को माँ के चरणों से हटाकर चेहरा देखने पर मजबूर किया l माँ की आँखों में आंसू थे l माँ निरुत्तर भाव से मूर्तिबद्ध खड़ी थी l विपिन को समझते देर न लगी कि जिस बेचैनी को माँ ने एक छोटी घटना के वर्णन से मिटा दिया था, वह और भी विकट रूप में क्षत विक्षत करने वाली थी l बेसुध विपिन पागलों की तरह घर में कुछ तलाशने लगा, छत पर गया, रसोई घर में गया, शयन कक्ष में गया, परन्तु जैसे ही वह बरामदे के द्वार पर पंहुचा तो दीवार पर टंगी तस्वीर को देखकर स्तब्ध रह गया पांव तो मानो फूल गए हो सर भारी होने लगा शरीर में मूर्च्छा आने लगी, शरीर एक सनसनाहट से सिहर उठा, माँ विपिन के पीछे खडी थी l विपिन माँ से लिपट गया l अश्रु धारा के रूप में असीम दुःख माँ की साड़ी को भिगो चुका था बस दो ही भाव रह रह कर विपिन के मन में आये जा रहे थे l

एक  प्रश्न कि क्यों लोगों को लालच से दूर रहने का सन्देश देने वाले भगवान खुद अपने स्वार्थ के लिए अच्छे लोगों को अपने पास बुला लेते हैं l

दूसरी वह ध्वनि जो निरंतर उसके कानों में गूँज रही थी कि,

” भैया! आओ तो ये ले आना l भैया! देखना, अबकी बार मैं आपकी तरह फर्स्ट आउंगी भैया आपके जाने के बाद हमेशा मैंने मम्मी पापा का ध्यान रखा, उनकी हर बात मानी l में हमेशा  आपकी अच्छी बहन रहूंगी l “

“हां! तुम तो अच्छी थी जो भाई को छोड़ते समय भी उसको तकलीफ देना नहीं चाहती थीl माँ को हिम्मत देकर कैसे झूठ बोलना सिखा दिया l बहिन को विदाई देना तो हर भाई की जिम्मेदारी होती है, तुमने तो मुझे यह जिम्मेदारी भी नहीं निभाने दी l तुम्हारे लिए उपहार लाया था, सरप्राइज था, पर पता नहीं था कि तुम मुझे  मात दे जाओगी l वैसे, तुम्हारा भी अच्छा है, पहले जब साथ थी तो बात नहीं कर पाती थी कायदे में और अब जब इतनी दूर हो तो अपनी यादों की वो सोगातें छोड़कर गयी हो, जिन्हें याद करके मैं तुमसे हर दिन बातें करूँगा l”

भाई की भावनाएं मानवता के गर्त की अनुभूति कराने लगीं l

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