दो बच्चे कैसे बढ़िया दोस्त बन, यह दास्तां बयां करती है यह कहानी|

 

 

मोनू आज भी सुबह सुबह अपने घर से विद्यालय जाने के निकला और अपनी माँ के साथ विद्यालय को जाने लगा। मोनू रोज रोड पर जितनी भी दुकाने होती उन सबको देखते और निहारते हुए विद्यालय को जाता था। ऐसे ही आज भी वो विद्यालय पहुँच गया और रोज की तरह आज भी अपनी माँ से रुपयो के लिए जिद करने लगा। आज भी हर रोज की तरह मोनू को उसकी माँ ने दस रूपये थमा दिए और मोनू खुश होकर विद्यालय चला गया। विद्यालय की पढाई की बाद जब छुट्टी हुई तब रोज की भाँति आज फिर मोनू अपनी माँ के साथ घर के लिए वापस आ रहा था। रोज की तरह आज फिर सभी दुकानों को देखता हुआ आगे निकल रहा था और फिर एकदम से आइसक्रीम की दुकान पर रुक गया और झट दस रुपये की एक आइसक्रीम खरीद ली। फिर वह अपनी माँ के साथ चलने लगा। अब वह आइसक्रीम की चुस्किया लेता हुआ सभी दुकानों को देखता हुआ जा रहा था और चलते-चलते वह गोविन्द की चाय की दुकान के सामने पहुँच गया। आज भी उसने उसी एक बच्चे को चाय की दुकान में काम करते हुए देखा और फिर आज मोनू मायूस सा हो गया। मोनू रोज उसी एक बच्चे को गोविन्द की चाय की दुकान पर काम करते हुए देखता था और फिर उसके मन में उस बच्चे के लिए दया भावना आ जाती थी और आती भी क्यों नही उस बच्चे की उम्र दस वर्ष के आसपास की होगी और बचपन में ही वह काम पर लग गया। उसे यह देख बहुत दुःख हो रहा था।

उसके मन में जबतक इतनी बाते आई ही थी कि वह अब उस दुकान से काफी आगे पहुँच गया था और फिर रोज की तरह थोड़ी ही देर में घर पहुँच गया। मोनू अपने घर में इकलौता था, उसका कोई भाई-बहन न था और यही कारण था कि वह बहुत जिद्दी था। अगले दिन फिर वह अपनी माँ के साथ विद्यालय से घर की तरफ आ रहा था और आज भी उसके हाथ में दस रूपये का नोट था और वह मन ही मन सोच रहा था कि आज वो दस रूपये उस चाय की दुकान में काम कर रहे उस बच्चे को दे देगा और अगर किसी ने कुछ पूछा तो कह दूंगा रूपये खो गया। इतना सोचते-सोचते वह काफी दूर आ चुका था और अब उसे चाय की दुकान दिखने लगी थी। कुछ ही कदम में वह गोविन्द की चाय की दुकान पर पहुँच गया और उसने जानबूझकर दस रूपये का नोट उस बच्चे के सामने गिरा दिया।

वह नोट उस बच्चे ने गिरते हुए देख लिया और उसने आकर वह नोट उठा लिया। अबतक मोनू दुकान से आगे निकल चुका था पर फिर भी वह बच्चा दौड़ा हुआ मोनू के पास आया और उसे कहा,”भैया आपके दस रूपये गिर गए है”। अब मोनू को यह समझ नही आ रहा था कि उस बच्चे ने वो दस के रूपये वापिस क्यों नही दिए फिर भी वो अपनी माँ के साथ आगे बढ़ गया। मन ही मन मोनू यह सोच रहा रहा था कि वह उस बच्चे की मदद नही कर पाया और वही उसे उस बच्चे की ईमानदारी पर हैरानी हो रही थी। यही सब सोचते-सोचते वो घर पहुँच गए। मोनू को अब उस बच्चे मिलने का मन हो रहा था। शाम को वह अपने घर से चुपचाप निकल गया। उसके घर से गोविन्द की चाय की दुकान करीब पाँच मिनट की दूरी पर था। मोनू तेज़ कदमो से चाय की दुकान पर पहुँच गया, अब भी उसके पास दस रूपये थे। उसने दुकान पर एक चाय मंगवाई और वह लड़का चाय लेकर आया। मोनू ने उससे चाय ली और उससे उसका नाम पूछा। उस लड़के ने अपना नाम बताया, जी राजू।

मोनू ने उसे कहा ,”तुम मेरे दोस्त बनेगो”। राजू हँसते-हँसते बोला ,’आप भी कहा मेरे से दोस्ती करना चाहते है, आपमें और मेरे में जमीन आसमान का अंतर है”। जभी राजू को आवाज़ आई और वह चला गया। मोनू थोड़ी देर तक राजू का इंतज़ार करता रहा। फिर थोड़ी ही देर में राजू फिर मोनू के पास आया।  मोनू ने राजू से कहा,” आज से तुम मेरे दोस्त हो, मेरा नाम मोनू है”। इतना कहकर मोनू ने अपना हाथ राजू की तरफ बढ़ा दिया, राजू ने भी सोचते-सोचते उसका हाथ थाम लिया। अबतक काफी समय बीत चुका था और मोनू वहाँ से घर की तरफ निकल पड़ा।  घर पर अभी तक किसी को भी उसके बाहर जाने का पता नही था और इसीलिए वो खुश था। आज उसने अपना एक नया दोस्त बनाया था। अगले दिन विद्यालय जाते और आते वक़्त मोनू ने राजू की तरफ देखा और दोनों मुस्कराये। इस दिन फिर मोनू शाम को छुप कर घर से निकल गया और राजू से जाकर मिला। आज उसने राजू से पूछा, ” तुम काम क्यों करते हो और क्या तुम्हे पढ़ने का मन नही करता?”। यह सुनकर राजू मायूस हो गया और फिर बोला,” मुझे भी पढ़ने का बहुत मन करता है पर मजबूरी के कारण यहाँ काम करता हूँ, मेरे माता-पिता बचपन में ही स्वर्ग सिधार गए थे, उस समय मेरी उम्र आठ वर्ष थी और फिर मैं अपने चाचा के साथ रहने लगा और फिर कुछ ही महीनो में उन्होंने मुझे इस चाय की दुकान में काम पर लगा दिया”। यह कहते-कहते राजू की आँखों के साथ-साथ मोनू की आँखों में भी आँसू आ गए थे।

मोनू भले ही बच्चा था पर राजू के दर्द को अच्छे से समझ रहा था। मोनू ने फिर राजू को कहा,” अगर तुम पढ़ना चाहते हो तो बढ़िया है और इसमें में तुम्हारी पूरी मदद करूँगा” । उसके बाद मोनू अपने घर निकल गया और थोड़ी देर में अपने घर पहुँच गया। आज भी उसकी माँ को कुछ पता न चला। आज मोनू ने अपनी सारी पुरानी किताबे निकाली ली। अगले दिन शाम को मोनू ने अपनी किताबे ली और घर से निकल गया। आज फिर मोनू जाकर राजू से मिला और उसे अपनी सारी पुरानी किताबे राजू को सौप दी। राजू किताबे देखकर बहुत खुश हुआ और मोनू को ध्यनवाद देने लगा। अब मोनू रोज शाम को घर से निकलता और राजू से मिलता था। वह राजू को पढ़ाता और राजू भी कुछ विषय मोनू को पढ़ाता था।

ऐसे ही दिन बीते जा रहे थे और फिर एक दिन मोनू की माँ ने मोनू को घर से बाहर निकलते हुए देख लिया। फिर मोनू की माँ ने उसका पीछा किया। आज भी मोनू, राजू को पढ़ा रहा था और यह देखकर मोनू की माँ को बहुत ख़ुशी हुई। आज उन्हें अपने बेटे पर गर्व हो रहा था। थोड़ी देर में उन्हें छोड़कर वो वहाँ से निकल गयी। मोनू भी थोड़ी देर बाद घर पहुँचा, रोज की तरह आज भी उसे ऐसा लग रहा था कि उसकी माँ को कुछ नही पता। वो अभी अपने कमरे में पहुँचा ही था कि उसकी माँ भी उसके कमरे में पहुँच गयी। मोनू को अबतक समझ नही आ रहा था कि उसकी माँ अचानक उसके कमरे में कैसे आ गयी। तभी  उसकी माँ ने मोनू से पूछा,” तुम अभी बाहर कहाँ गए थे?”। यह सुनते मोनू समझ चुका था कि उसकी चोरी पकड़ी गयी है। फिर मोनू ने चुप रहना उचित न  समझा और राजू की पूरी कहानी अपनी माँ को सुना दी। मोनू की माँ भी राजू की कहानी सुनकर भावुक हो गयी और साथ ही साथ वह बहुत खुश हो रही थी कि उनका बेटा किसी की मदद कर रहा था। मोनू की माँ को अब समझ आ गया था कि मोनू कुछ दिनों से इतना सुधर क्यों गया है और पढाई में दिनोदिन उसका स्तर भी बढ़िया क्यों हो गया है।

अगले दिन मोनू के साथ मोनू की माँ भी राजू से मिलने गयी। मोनू की माँ ने राजू को रहने के लिए अपने साथ चलने को कहा पर राजू भी स्वाभिमानी था, उसने साफ़ मना कर दिया। उसने कहा,” मै आप सब बोझ नही बनना चाहता और मै खुद कमाकर ही खाऊँगा”। मोनू की माँ भी अबतक समझ चुकी थी कि राजू ऐसे उनके घर पर रहने नही आएगा। फिर उन्होंने राजू से कहा,” तुम मेरे घर के काम कर देना और बदले में हम तुम्हारा और तुम्हारी पढाई का खर्चा उठाएंगे और यह तुम्हारी तनख्वा होगी”। पहले तो मोनू ने मना कर दिया पर जब मोनू ने उसे दोस्ती का वास्ता दिया तो वह उनके साथ चलने को तैयार हो गया। मोनू की माँ ने दुकान के मालिक गोविन्द जी से उसके लिए बात कर ली और फिर राजू को अपने साथ लेकर चली गयी।

अब राजू भी सब बच्चों की तरह विद्यालय जाने लगा। राजू रोज सुबह विद्यालय से जाने से पहले घर के काम करता व विद्यालय के बाद भी घर के काम करता था और जभी अपने आप को वक़्त देता था। अब मोनू और राजू दो बहुत बढ़िया दोस्त बन चुके थे और दोनों मिलजुल कर पढ़ते और खेलते थे। इस तरह उनकी दोस्ती कायम रही और पन्द्रह वर्ष बाद दोनों ने सिविल सेवा की परीक्षा पास कर ली थी। अब दोनों अलग-अलग रहते थे और अपना कार्य करते थे। भले ही दोनों अलग-अलग रहने लगे हो पर उनकी दोस्ती अभी भी कायम थी।..

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