यह कहानी एक लकड़हारे और एक सेठ की दोस्ती की बयां करता है।

                          

पुराने समय की बात है, एक गाँव में एक लकड़हारा रहता था। इस लकड़हारे का नाम भोलू था। भोलू की उम्र तकरीबन तीस वर्ष की होगी। उसका साधारण सा परिवार था। उसके परिवार में उसकी एक बूढ़ी माँ, उसकी पत्नी व उसके दो बच्चे थे। एक बेटे की उम्र सात वर्ष और एक बेटे की उम्र पाँच वर्ष थी। भोलू यूँ तो ज्यादा नही कमा पाता था पर इतना कमा लेता था कि वह अपने परिवार का गुज़ारा आराम से चला लेता था। वह अपने गाँव के निकट ही स्थित जंगल में लकड़िया काटता था और उन्हें शहर में जाकर बेच आता था। वह बिल्कुल साधारण सा व्यक्ति था। भोलू का जैसा नाम था वैसा ही उसका स्वभाव था।

गाँव में सभी व्यक्ति भी उसकी इज्ज़त करते थे। वह रोज सुबह सुबह ही उठ जाया करता था और फिर पास ही के तालाब में रोज जाकर नहाया करता था। रोज स्नान करके वो सर्वप्रथम मंदिर पूजा करने के लिए जाया करता था। पूजा करके आने के बाद नास्ता करके अपना खाना और कुल्हाड़ी लेकर जंगल चले जाया करता था। दिनभर जंगल में लकड़िया काटता था और फिर शाम को उनको ले जाकर शहर में बेच आया करता था। इससे आये धन से वह अपने परिवार का गुज़ारा चला लेता था तथा कुछ धन भविष्य के लिए बचा भी लिया करता था। गाँव से शहर जाने के लिए केवल एक ही रास्ता था और यह रास्ता जंगल से होकर गुज़रता था।

इस रास्ते में सुबह शाम तो काफी चहल पहल रहती थी पर रात को यह बिल्कुल सुनसान हो जाता था। अँधेरा होने के बाद कोई भी इस रास्ते पर कभी न जाया करता था। कई बार रात में कुछ लुटेरो ने इस रास्ते पर लोगो को लूट लिया था। इसीलिए रात में सब इस रस्ते पर जाने से डरते थे। पर भोलू की जिंदगी यूँ ही साधारण सी कट रही थी। रोज वह अपना काम पूरी ईमानदारी से करता और मेहनत से धन कमाकर घर आ जाया करता था। एक दिन भोलू जैसे ही मन्दिर से पूजा करके बाहर निकला वैसे ही उसने देखा उसका बड़ा बेटा दूर से भाग भाग कर आ रहा है। अपने पिता से मिलते ही उसने बताया कि उसकी दादी की तबीयत बहुत खराब हो गयी है। भोलू यह सुनकर अपनी पूजा की थाली अपने पुत्र को सौंप कर सीधे वैद्य जी को बुलाने के लिए निकला। शीघ्र ही वैद्य जी भोलू के साथ उसके घर पहुँचे। भोलू की माँ दर्द से करहा रही थी। वैद्य जी ने तुरन्त भोलू की माँ को देखा। उन्होंने देखकर तत्काल उपचार के लिए दवाई दे दी। फिर उन्होंने भोलू को बताया कि उनकी माँ को कोई गंभीर बीमारी है और इसका उपचार केवल शहर में ही हो सकता है। वैद्य जी ने भोलू को जल्द से जल्द शहर के अस्पताल में जाने को कहा और फिर वह वहाँ से चले गए। उनके साथ साथ भोलू भी घर से निकला। भोलू बैलगाड़ी को बुला कर अपने घर पर लाया। फिर घर में उसने अबतक की करी हुई जमा-पूंजी अपने पास रख ली।

उसके बाद उसने अपनी माँ को बैलगाड़ी में बिठाया और अपनी पत्नी को साथ लिया और बैलगाड़ी पर सवार होकर शहर की ओर निकल पड़ा। अपने बच्चों को उन्होंने अपने घर में ही पड़ोसियों के ध्यान में ही छोड़ दिया। भोलू ने शहर में अपनी माँ को बड़े अस्पताल में दिखाया। डॉक्टर ने भोलू की माँ को अच्छे से देखा और फिर बताया कि उनको गंभीर बीमारी है और इसका इलाज़ केवल ऑपरेशन से ही संभव है। ऑपरेशन के लिए काफी धन की जरूरत थी। डॉक्टर ने बताया इलाज़ में लगभग बीस से पच्चीस हज़ार रुपयो का खर्चा आएगा। भोलू पर इतने रुपये नही थे पर उसके लिए अपनी माँ की जिंदगी जरुरी थी। इसीलिए भोलू ने डॉक्टर को इलाज़ शुरू करने को कह दिया। भोलू ने अपनी जमा-पूंजी गिनी। उसके पास केवल चार हज़ार रुपये थे।

उसमे से उसने साढ़े तीन हज़ार रूपये अस्पताल में तुरन्त जमा करा दिए। अब उसे किसी भी तरह से लगभग बीस हज़ार की जरूरत और थी। इसलिए वो अपनी पत्नी को अस्पताल में अपनी माँ के पास छोड़कर गाँव निकल गया। उनके बच्चे भी घर में अकेले थे और उनके खाने पीने के इंतज़ाम के लिए भोलू का घर आना जरुरी था। शाम होते होते भोलू अपने घर आ गया और तब उसने अपने बच्चों के लिए खाना बनाया। फिर उसने बच्चों को खाना खिलाकर सुला दिया और फिर खुद भी खाना खा लिया।  अबतक भोलू को केवल एक ही चिंता सता रही थी। उसे किसी भी तरह से कुछ ही दिनों में इतनी बड़ी रकम की जरूरत थी। रात भर उसके मन में एक ही बात घूम रही थी।

अगले दिन रोज की तरह आज भी भोलू स्नान करके मंदिर में पूजा करने के लिए गया। पूजा करने के बाद वो रुपयो का इंतज़ाम करने के लिए निकल गया। भोलू धन के इंतज़ाम के लिए कई साहूकारों से जाकर बात की पर सबने उसे उधार देने से मना कर दिया। क्योंकि सभी जानते थे कि रकम बहुत बड़ी है और भोलू की न ही इतनी आमदनी थी व उसके पास सम्पति के नाम पर केवल उसका एक छोटा सा घर था। भोलू को हर जगह निराशा हाथ लगी थी और वह अब टूट चुका था। पर उसके पास अभी भी अंतिम उम्मीद बची हुई थी और वह थी सेठ धनीराम। धनीराम हीरो के बहुत बड़े व्यापारी थे। उनका व्यापार के लिए शहर से आना जाना होता रहता था। यूँ तो सेठ धनीराम का पेशा उधार देने का नही था फिर भी वह कभी कभार लोगो की मदद कर दिया करते थे। उनका स्वाभाव बहुत अच्छा था।

भोलू अब धनीराम से जाकर मिला। धनीराम को भोलू ने अपनी पूरी आप बीती सुना दी और फिर रोने लगा। वैसे तो इतनी बड़ी रकम देने से सेठ धनीराम को भी डर था पर फिर भी उसने भोलू को उधार देने की लिए हामी भर दी। वैसे तो सेठ धनीराम को पता था कि भोलू के पास कोई अधिक संपत्ति नही थी और न ही उसके पास कोई आय का बढ़िया श्रोत था। फिर भी धनीराम को दया आ गयी और उसने तत्काल दस हज़ार रूपये दे दिए और दस हज़ार लेने के लिए भोलू को अगले दिन बुलाया। भोलू ने सेठ धनीराम को बहुत बहुत ध्यनवाद दिया और कहा ,” मैं जल्द से जल्द आपके सारे रुपए लौटा दूँगा और आपको कभी भी मेरी जरूरत हो तो मुझे याद करना मैं आपके लिए सबकुछ करने को तैयार हूँ”। यह सुनकर सेठ धनीराम भी हँसने लगा और बोला, ” मुझे तुम्हारी क्या जरूरत होगी,तुम अपना ही भला कर लो और जल्द से जल्द मेरा उधार चुका देना”।

फिर भोलू वहाँ से रूपये लेकर घर गया। वहाँ उसने नास्ता बनाया और डब्बे में खाना लेकर और रुपये लेकर शहर की ओर निकल पड़ा। अगले दिन उसने धनीराम से बाकी रूपये भी ले लिए और अपनी माँ का अच्छे से उपचार करवाया। उसकी माँ कुछ ही दिन में बढ़िया हो गयी और जल्द ही गाँव में रहने आ गयी। अब भोलू को बस धनीराम का कर्ज़ चुकाना था और इसीलिए वह अब पहले से भी अधिक मेहनत करने लगा। उसने अपने सभी खर्चे भी बहुत कम कर दिए थे और वह अधिक से अधिक धन बचत करने लगा था। अब भोलू शाम को भी बहुत अधिक समय तक काम करता था और कई दिनों में एक बार शहर जाकर सभी लकड़िया थोक में बेच आया करता था। ऐसे ही दिनचर्या के साथ दो महीने बीत गए और अबतक भोलू पाँच हज़ार रूपये ही जमा कर पाया था। उसने यह पाँच हज़ार रूपये समय निकालकर सेठ धनीराम को पहुँचा दिया अब भी उसपर पंद्रह हज़ार रुपयो का कर्ज बाकी था। उसके बाद भी वह पूरी मेहनत से काम करता रहा।

फिर एक दिन की बात है सेठ धनीराम बाजार से अपना व्यापर करके जंगल के रास्ते से गाँव वापिस लौट रहा था।  अभी अँधेरा होना शुरू ही हुआ था और इसीलिए सेठ धनीराम अपने मुंशी के साथ तेज़ी से आ रहा था। तभी अचानक कुछ लुटेरो ने उन दोनों को घेर लिया और उनसे उनका धन मांगने लगे। यह देख सेठ धनीराम जोर से चीख पड़ा,” बचाओ , बचाओ”। आज भी भोलू देर तक जंगल में काम कर रहा थ और जैसे ही उसने यह आवाज़ सुनी वैसे ही वह आवाज़ की दिशा में दौड़ पड़ा। रास्ते पर पहुँचते ही भोलू ने देखा कुछ लुटेरो ने सेठ धनीराम को घेर रखा है। भोलू ने तुरन्त बड़ी ही चालाकी से अपनी कुल्हाड़ी लुटेरो के सरदार के गले के पास रख दी और सबको अपने हथियार नीचे रखने को कहा। लुटेरो ने भी डर कर अपने हथियार नीचे गिरा दिए और फिर उन हथियारों को सेठ ने उठा लिए।

भोलू लुटेरो के सरदार को अपने कुल्हाड़ी के नोंक के नीचे गाँव तक ले आया और फिर उसे छोड़ दिया। आज सेठ धनीराम सिर्फ भोलु की वजह से सुरक्षित बच पाये थे। उन्होंने भोलू को ध्यनवाद कहा और फिर बोले,” अगर आज तुम मुझे नही बचाते तो न जाने मेरे साथ क्या होता, मै तुम्हारा यह अहसान जिंदगी भर नही भूल पाऊंगा”। फिर भोलू ने बोला,” नही नही आप ऐसा मत कहिये, यह तो मेरा फर्ज़ था और वैसे भी आपने मेरी इतनी मदद की है कि आपके लिए तो मै अपनी जान भी दे सकता हूँ”। यह सुनकर सेठ धनीराम भावुक हो गए और फिर उन्होंने दोस्ती का हाथ भोलू की तरफ बढ़ा दिया। भोलू ने भी दोस्ती का हाथ थाम लिया और दोनों दोस्त बन गए। सेठ धनीराम ने दोस्ती का नाता देकर भोलू का सारा कर्ज़ भी माफ़ कर दिया। पुरे गाँव में उन दोनों की नई दोस्ती की चर्चा थी। इन दोनों की दोस्ती मरते दम तक साथ रही और दोनों ने जिंदगी भर एक दूसरे का हर सुख-दुःख में साथ दिया।..

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