आज से विद्यालय में गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो गई, बच्चों को न जाने कितने दिन से इसका इंतज़ार था। सभी बच्चों की ख़ुशी का ठिकाना नही था, अब दो महीने तक उनकी मौज जो हो गई थी। इन दो महीने में कोई उन्हें विद्यालय जाने को नही कहने वाला था , अलग-अलग जगह घूमने को मिलती, मन भर खेलने को मिलता, बस इतना ही तो चाहिए बच्चों को। राघव भी आज बहुत खुश हो रहा है, न जाने उसे आज कौन-सी आज़ादी मिल गई है। गर्मियों की मौसम की तो बात ही अलग है।

हर सड़क-गली पर आमो की दुकान, आइसक्रीम के ठेले, शिकंजी के ठेले, जूस के ठेले देखे जा सकते थे। इन सभी के साथ-साथ पतंगों की भी दुकान लगनी शुरू हो गई थी। राघव के लिए तो पूरी दुनिया में सबसे प्रिय चीज़ पतंग ही थी। पतंगों का नाम सुनकर ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी। उसे पतंगे उड़ाने का बहुत शौक था। उस वक्त उसकी उम्र तकरीबन दस वर्ष होगी। गर्मियों की छुट्टियाँ का मतलब उसके लिए केवल इससे था कि अब उसे पतंग उड़ाने के लिए दिनभर का समय मिल गया है।

इस पतंग के चक्कर में न जाने कितनी बार उसने अपने घर में डाँट खाई और न जाने कितनी बार वो पिटा होगा। पर उसपर इन सब का कुछ असर नही होता था। पतंग के लिए तो वो न जाने कितनी परेशानी झेल सकता था। इस बार भी हर बार की तरह वह अपने जेबख़र्च के सभी रुपयो से पतंग और मांझा खरीद लेता था। जब वह पतंग की दुकान पर पहुँचता तो रंग-बिरंगी विभिन्न तरह की पतंगे उसका मन मोह लेती थी, इसी तरह विभिन्न तरह के मांझे और चरखरी भी उसका मन मोह लेते। उसका तो मन करता कि वो पूरी दुकान ही उठा ले पर उसके पास इतने रुपये हो तब न। हर तरह की नई-नई  पतंगे उसे अपनी ओर आकर्षित करती थी। उसके लिए  पतंगों का चुनाव करना मुश्किल हो जाता था, जो पतंग उठाये वही पसंद आ जाये। रूपयो की कमी को देखकर वो आखिर में बड़ी ही मुश्किल से कुछ पतंग चुन ही लेता था।  दुकानवाले के लिए तो राघव उसका नियमित ग्राहक था। अब छुट्टियों में राघव रोज सुबह-शाम पतंग और मांझा लेकर छत पर चढ़ जाता था, फिर तो बस तुरन्त पतंगबाज़ी शुरू। शाम को तो उसकी छत पर बच्चों की टोली जमा हो जाती थी।

राघव के दोस्त भी पतंग उड़ाने के लिए उसकी ही छत पर आ जाते थे। अब तो यह रोज का नियम बन गया था। वैसे तो राघव के दोस्तों में अधिकतर दोस्त राघव से बड़े थे पर पतंगबाज़ी में सबसे अनुभवी राघव ही था। राघव पतंगबाजी में सबका उस्ताद था और उसके दोस्त इसीलिए उसे उस्ताद कहकर ही बुलाते थे। रोज शाम को कड़ी धूप में सब इक्कठे हो जाते और फिर जब तक अँधेरा न हो जाये तब तक वही रहते। उस समय आसमान में तरह-तरह की पतंगे उड़ती हुई दिखाई देती थी। आसमान में ये पतंगे लहराती हुई बहुत सुंदर प्रतीत होती थी, ऐसा लगता मानो कितने सारे पक्षी आकाश में उड़ रहे हो। वैसे तो पतंग उड़ाने में राघव को बहुत आनन्द मिलता था पर उसे सबसे ज्यादा ख़ुशी तो केवल दूसरो की पतंग काटने में ही मिलती थी। राघव का ध्यान हमेशा दूसरो की पतंग काटने पर ही रहता था। इस खेल में राघव ने कई महारथियों को धूल चटाई थी। राघव की उम्र भले ही बहुत छोटी हो पर वो आसानी से बड़े-बड़े लोगो की पतंगे काट देता था। इससे भी ज्यादा मज़ा तो उसे कटी हुई पतंगों को लूटने में आता था, उसके लिए तो वो अपनी पतंग भी छोड़ देता था।

उसके लिए तो चाहे अपनी पतंग कट जाये पर दूसरो की कटी पतंग लूटना जरुरी होता था। पतंग कटते देख वो अपनी पतंग छोड़ कर भी उसे लूटने के लिए दौड़ पड़ता था। एक छोटी सी पतंग मामूली सी जिसकी कीमत मामूली सी है, एक छोटे बच्चे के चेहरे पर  एक बड़ी-सी मुस्कान ला देती थी। ऐसा लगता तो मानो दुनिया-भर की ख़ुशी मिल गई हो।  जैसे ही कोई पतंग आती सभी बच्चे उसे लपकने के लिए तैयार रहते और जिसके हाथ वो लग गई, फिर तो वो इतना खुश होता कि जैसे विश्व जीत लिया हो।

पतंगों की होड़ तो पंद्रह अगस्त के दिन होती थी। इस दिन का इंतज़ार तो हर बच्चा करता था। इस दिन का इंतजार तो राघव को भी रहता था। राघव इस दिन के लिए गुल्लक में रूपये जमा करता था। इस बार भी बच्चों का इंतज़ार खत्म हुआ और पंद्रह अगस्त का दिन आ गया। राघव ने अपनी गुल्लक तोड़ी और जितने भी रुपये मिले सब लेकर चल पड़ा पतंग की दुकान पर।

पंतगों की दुकान पर आज उसने ढेर सारी पतंगे खरीदी, तरह-तरह के मांझे और पसन्द की चरखरी भी ले लिए। आज उसके लिए सबसे बड़ा त्यौहार था और इसीलिए सुबह ही पतंग व अन्य सामान लेकर छत पर पहुँच गया और उसके दोस्त भी सुबह-सुबह उसकी छत पर आ गए। सभी दोस्तों का आज पूरे दिन का पूरा इंतज़ाम वही पर था। सभी के चेहरे उनकी ख़ुशी बयाँ कर रही थी। पूरा आकाश रंग-बिरंगी लहराती हुई पतंगों से भरा हुआ था। पतंगों की होड़ शुरू हो चुकी थी और इसमें राघव की पतंगे भी शामिल थी। राघव ने पतंग उड़ानी शुरू की, आज भी वह अच्छी पतंगे उड़ा रहा था और शुरुआत से ही दूसरो की पतंगे काट भी रहा था। जैसे ही वो दूसरो की पतंग काटता उसके चेहरे पर ख़ुशी आ जाती। उसके दोस्त भी अपनी-अपनी पतंग उड़ाने में व्यस्त थे।

धीरे-धीरे समय बीता और दोपहर हो गई पर अब भी सब पतंग उड़ाने में मग्न थे। अबतक राघव की कई पतंग कट भी चुकी थी और उसने कई पतंगे काटी भी थी, जिसकी उसे ख़ुशी थी पर एक दुःख इस बात का था कि आज उसने एक भी पतंग नही लूटी थी। इसीलिए जैसे ही कोई पतंग उसकी तरफ कट के आती तो वो अपनी पतंग छोड़कर वो उसे लूटने के लिए दौड़ पड़ता पर कोई फायदा नही हुआ, शाम हो गई पर फिर भी राघव के हाथ कुछ नही लगा। अब वो मायूस हो गया और उसने पतंग उड़ाना छोड़ दिया। अब उसका ध्यान सिर्फ पतंग लूटने पर था पर कुछ फायदा नही और अब अँधेरा होना शुरू हो गया। इसीलिए अब वो अपना सामान समेट कर वापिस जाने के लिये खड़ा हुआ तभी अचनाक एक पतंग बड़े ही लंबे मांझे के साथ उसके सामने आ गई, इस बार बिन देरी किये राघव ने झपट कर पतंग लूट ली। इसकी ख़ुशी सिर्फ राघव ही जानता था। आज उसने मानो हारी हुई बाजी जीत ली थी, उसकी मायूसी अब ख़ुशी में तब्दील हो गई थी। इस दिन का अंत राघव की ख़ुशी के साथ हुआ। यह राघव के बचपन की आखरी पतंगबाजी थी।

उसके अगले वर्ष उसका दाखिला एक बड़े विद्यालय में हो गया और अब राघव छात्रावास में रहने लगा था। कई वर्ष बीत गए, उसका पतंग उड़ाना छूट गया, अब वो बड़ा हो गया और ये सब उसके लिए बचपन का छोटा खेल और यादे बन कर रह गयी थी। कई वर्षो बाद राघव ने बाहरवी की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। कई वर्षो बाद आज वो अपने घर को जा रहा है।

गर्मियों का मौसम ही चल रहा है। कुछ समय में वो अपने मोहल्ले में पहुँच गया। वह रास्ते से गुज़र ही रहा था कि तभी एक कटी पतंग पीछे से उसके सामने आ गई और बिना देरी किये उसने यह पतंग लपक ली। ऐसा करते ही उसे अपने बचपन की याद आ गई और वह खुश हो गया। उसने पीछे मुड़कर देखा तो एक बच्चा जो शायद पतंग लूटने के लिए भाग रहा था एकदम से रुक गया क्योंकि पतंग तो उसने पकड़ ली थी। राघव इस बात को भाँप गया था और उसने ये पतंग उस बच्चे को दे दी क्योंकि राघव पतंग लूटने की ख़ुशी जानता था। उस बच्चे को जैसे ही पतंग मिली, वह खुश हो गया और पतंग लेते हुए एक हँसी के साथ दौड़ पड़ा। उसके साथ-साथ राघव के चेहरे पर भी हँसी आ गई।

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