बचपन- हसीं ठिठोली का समय, अब अश्को में धूल रहा है, जो देश का भविष्य है, वो सड़कों पे पल रहा है, सासेंतो चल रही है, मगर कही दब गए है सपने, शायद उन्ही जूठे बर्तन ईंट-पत्थरों के नीचे|

 

खाने की चाह में रोता –बिलखता एक नन्हा सा बच्चा आया मेरे पास कहा बाबूजी एक रूपया दे दो! मैंने पूछा एक रूपया का क्या करोगे तो अपनी तोतली सी आवाज में बोला अपनी माँ और छोटी बहन का पेट भर लूंगा ! मानो जैसे उसकी बात सुनकर शरीर स्थिर पड़ गया हो वो बचपन की व्याख्या, वो रेत की  टीलें, बेफिक्र जीवन जैसे सारी बातें एक मिथ्या हो! अगर बच्चे भगवान का रूप होते हैं तो इस कलियुग ने अपनी प्रबलता दिखा ही दी जगत का पेट पालने वाला भी आज अपना पेट पालने के लिए मजबूर है!

बचपन, जीवन का एकमात्र ऐसा दौड़ जब चिंता और तनाव का दूर-दूर तक कोई अंदेशा नहीं होता है, जब बेफ़िक्र होकर बचपन दौड़ता है , रंग-बिरंगी तितलियों के पीछे, जब गिल्ली-डंडे के खेल में सब मशगूल रहते हों , उस दौड़ में अगर कोई इन सब सुखों से वंचित रह जाये तो शायद इससे ज्यादा बड़ा दुःख कुछ ओर नहीं होगा। जब ईंट-पत्थरों के बोझ के तले दब कर बचपन दम तोड़ दे, जब गंदे बर्तनों को धोते धोते एक दिन खुद की तकदीर धुलने लगे तब जो असहनीय पीड़ा होती है उससे कहीं न कहीं, उपर उस खुदा का भी दिल कचोटता होगा। उस बच्चे के अश्कों को देख जैसे मेरा दिल भी पसीज गया, जेब से दस रुपये का नोट निकालकर उसकी ओर बढ़ाया तो उसने लेने से इनकार कर दिया ! बोला बाबूजी बस एक रुपया चाहिए, मैंने सवाल किया कि एक रुपये में कुछ नहीं मिलेगा ये रुपये रख लो, तू मुस्कुराते हुए जवाब आया बाउजी 10 रुपये तो मैंने पहले ही पास के एक ढाबे में बर्तन धो कर कमा लिए थे, बस रोटी-सब्जी का दाम ग्यारह रुपये है और दूकानदार दस रुपये में देने से मना कर रहा है! उसकी उस मासूम मुस्कान में उसकी खुद्दारी की एक अलग चमक देखी मैंने उस रोज !

बचपन- हसीं ठिठोली का समय, अब अश्को में धूल रहा है, जो देश का भविष्य है, वो सड़कों पे पल रहा है, सासें तो चल रही है, मगर कही दब गए है सपने, शायद उन्ही जूठे बर्तन ईंट-पत्थरों के नीचे !

 

Share If You Care!

Responses