बचपन की यादों को एक बार फिर जीवंत करने, एक बार फिर खुद को भूल झुम आते हैं बचपन के उस अल्हड़ सावन में, झूमती मस्ती में और बेपरवाह भागते हैं उन रंगीन तितलियों के पीछे|

 

बचपन- वो दौड़ जब माँ की कही हर बार पर बच्चा आंख मूंद कर विश्वास कर लेता है इसीलिए नहीं क्योंकि बात ऐसी थी बल्कि इसीलिए क्योंकि उसकी माँ ने बोला है! विश्वास और यक़ीन का अगर जीवन के किसी किसी दौड़ में सबसे मजबूत रिश्ता होता है तो वो बचपन ही है, मासूमियत और अल्हड़पन का एक ऐसा समागम समेटे होता है बचपन जहां ईर्ष्या, द्वेष का नामो- निशान तक नहीं होता और जीवन में सब कुछ अच्छा और आनंदित लगता हैं! तो आइये चलते है उसी बचपन की यादों को एक बार फिर जीवंत करने, एक बार फिर खुद को भूल झुम आते हैं बचपन के उस अल्हड़ सावन में, झूमती मस्ती में और बेपरवाह भागते हैं उन रंगीन तितलियों के पीछे!

बचपन की कुछ यादें जैसे अब भी है ताजा इस मिटटी के तहखाने में, रोज सिरहाने रख कर जिसको सो जाता हूँ अनजाने में ! तो आज चलो चलते है सैर पर उन्ही यादों की गलियों में उन्ही भटके हुए रंगरलियों में ! केक के ऊपर पड़ी वो लाल सी चेरी और डालियों पे लटकी हुई वो हरी-हरी कैरी ! वो आँख बंद कर 1 से 10 तक की गिनती और बॉल वापस मांगने के लिए की गयी बार-बार विनती ! वो जहाज को जाते देख जोरो से ‘बाई’करना और अपनी नाक को जीभ से छूने का ट्राय करना ! वो सारा दिन मिटटी में बेफिक्र लोटना  और डाँट लगने पर माँ को प्यार से पोटना! वो स्कूल से घर आ कर कॉपी में वेरी गुड गिनवाना और दूध का गिलास देख झट से छिप जाना! वो रात भर नींद में एक सुकून का एहसास और माँ की बातें सुनकर ईश्वर पे विश्वास !

मगर अब इन बातों का तो बस एक ‘याद’ ही बसेरा है बस ‘याद’ में ही ये जीवित है और ‘याद’ ही इनका डेरा है !!

 

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