तुम भी जब अपने कोरे चेहरे पर बस ‘बिंदी’ लगाती हो, तो तुम्हारे चेहरे कोपढ़ने में जो आनन्द की अनुभूति होती है भला वो भी शब्दों में कहाँ बयान  हो पाता है|

 

यूँ तो ईश्वर की हर रचना को शब्दों के सहारे जोड़कर या तोड़कर ‘नज़्म’ कर देता हूँ ! पर जब बात तुम्हारी आती है तो न जाने क्यों मन के भाव शब्दों के अभाव में कही दफ़न से हो जाते हैं, कलम भी बस टकटकी लगाए कोरे कागज को निहारता रह जाता है और अंत में, अंत में बस उस कोरे कागज पर एक ‘बिंदु’ डालकर दाब देता हूँ किताबों के पन्नो के बीच! शायद सही ही करता हूँ तुम भी जब अपने कोरे चेहरे पर बस ‘बिंदी’ लगाती हो, तो तुम्हारे चेहरे को पढ़ने में जो आनन्द की अनुभूति होती है भला वो भी शब्दों में कहाँ बयान  हो पाता है !

तुम्हारी बिंदी और उस कोरे कागज पे बनाये बिन्दु में हालांकि कोई समानता नहीं है मगर ये बिलकुल वैसा ही है, जब बंजर पड़े खेत में किसान के शरीर पर बारिश की वो पहली बूँद पड़ती है न, तो वो इस बात की चिंता नहीं करता कि मूसलाधार बारिश होगी भी कि नहीं, बारिश की वो पहली बूँद खुद में इतना प्रेम और विश्वास बटोर लाती है की एक पल के लिए उस स्नेह में सब कुछ भूल वो किसान भी चिंतामुक्त हो जाता है! तुम्हारी बिंदी भी मेरे लिए कुछ ऐसा ही काम करती है, ऐसा नहीं कि मुझे तुम्हारा चेहरा अच्छा नहीं लगता बस बिना उस बिन्दी के तुमको अपने करीब पाकर भी न जाने क्यों सूनेपन का एहसास होता है ! और रही बात तुम्हारी व्याख्या करना शब्दों के द्वारा तो आँखें मूंदने के बाद यूँ तो बस तुम्हारा ही ख़याल आता है, हर बार तुम्हारा चेहरा जब मेरे स्मरण में आता है तो जैसे मेरे रोम-रोम में एक अलग सी आनंद का संचार होता है, लेकिन आँख खोलते ही जब इस एहसास को शब्दों के सहारे बयां करने का प्रयत्न करता हूँ, तो यह कलम भी जैसे बिलकुल तुम्हारी तरह नाक फुला के नाराज़ बैठ जाती है और तुम्हारी नाराज़गी का तो तुम्हे पता ही है मेरे शब्दों में भला इतनी हिम्मत कहाँ जो तुम्हें मना सके, हां वो अलग बात है की बाहों में आने के बाद तुम्हारा गुस्सा कुछ पिघल सा जाता हैं !

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