मणिपुर में उत्सव का माहौल था,    विदेशी  आक्रमण से मणिपुर की रक्षा कर युद्ध जीत कर उनका सेनापति राजकुमार चित्रांगद वापस आ रहा था । विश्व का महान धनुर्धर अर्जुन मित्रता का प्रस्ताव लेकर मणिपुर आया था। उसने मणिपुर के लोगो में राजकुमार के प्रति जो प्रेम तथा सम्मान था , ऐसा उसने कभी  और कहीं नहीं देखा था।  घोड़े पर सवार राजकुमार चित्रांगद गर्व से  आगे आगे  चल रहा था पीछे पीछे उनकी सेना । फूलों की वर्षा हो रही थी,  गुलाल हवा में उड़ रहे थे ।
अर्जुन मणिपुर नरेश का अतिथि था , वो राजमहल से दूर ‘ अतिथि महल’ में था,  जहां से राजमहल साफ दिखाता था। प्रातःकाल में चित्रांगद अपने साथियों  के साथ युद्ध अभ्यास के लिए निकला । उसी वक्त अर्जुन भी सैर पर निकला था । राजकुमार ने आम्र वृक्ष पर एक तीर चलाया तो सात फल एक गिरे । उसके साथी उनकी जय जयकार करने लगे तभी पीछे से एक तीर आया और वृक्ष के सारे फल गिरा दिया । ये तीर  अर्जुन का था।
‘ तुम कौन हो,  गांडिवधारी?’ राजकुमार ने पूछा ।
‘ मैं अपके राज्य का अतिथि हूं।’
‘ अतिथि का परिचय नहीं है क्या! ‘
‘ है न , वीरता और युद्ध ।’
‘ क्या तुम मुझे चुनौती दे रहे हो ।’
‘ जो तुम्हें लगता है वही सत्य है ।’
दोनो में युद्ध छिड़ गया । अर्जुन अपराजित था लेकिन  चित्रांगद भी कम नहीं था। दोनो तीरों पर तीर चला रहे थे । अर्जुन के तीरों ने राजकुमार चित्रांगद को निहत्था कर दिया,  रथ की छतरी गिरा दिया और मुकुट भी । मुकुट गिरते ही चित्रांगद के अजालंबूतानी केस खुल गए। अर्जुन आश्चर्य में पड़ गया , ये तो कन्या है । किसी युध्द में चित्रांगदा के विरोधी को नहीं पता चला था कि वह एक महिला है ।
राजकुमारी चित्रांगदा मणिपुर नरेश की अकेली संतान थी। मणिपुर का राजभार उसके उपर था,  राजा ने जनता के बीच ये भ्रम फैलाया था कि उनकी पुत्री नहीं  पुत्र है । चित्रांगदा इतनी वीर थी कि किसी को शक नहीं हुआ कि वह एक महिला है।
चित्रांगदा ने ऐसा कभी महसूस नहीं किया था जो आज कर रही थी । उसे एहसास हो रहा था कि वह एक महिला है,  पुरुष वेस धारण कर लेने से,  युद्ध जीत लेने से तथा लोगों को भ्रम में रखने से नारीत्व कर्तव्य से अलग नहीं हो सकती । उसे ये कर्तव्य निभाना ही है । उसे नहीं पता कि वह कौन था जिसने ये एहसास कराया था । वह बार-बार उसके बारे में सोच रही थी । उसका सुन्दर रुप और वीरता राजकुमारी का दिल ले गया था,  लेकिन वह वीर  राजकुमार उससे विवाह क्यों करेगा!  उसका विवाह तो सुन्दर सुकुमारी राजकुमारी  से होना चाहिए,  जिसकी तुलना विश्व भर में न हो सके।
राजकुमारी चित्रांगदा ने अपने पिता को अपने दिल की बात कही,  महाराज ने उसे स्त्री रुप में रहने की आज्ञा दी ।
राजकुमारी ने कामदेव की आराधना की । कामदेव प्रकट हुए और उसकी इच्छा पूछी ।
चित्रांगदा ने कहा, ‘हे देव ! कृप्या मुझे स्त्री भेष प्रदान करें । ऐसा रुप गुण दे कि इन्द्रप्रस्थ का राजकुमार को मेरे सिवाय और कोइ न दिखें । मेरे विवाह प्रस्ताव को स्वीकार कर लें ।’
कामदेव मुस्काते हुए बोले, ‘ हे देवी मैं आपको स्त्री भेष प्रदान कर सकता हूं । रुप गुण प्राप्त करने में मेरी  पत्नी रती आपकी  मदद करेगी लेकिन जिस पुरुष पर आप विजय चाहती है उस पर मेरा वश न होगा ।’
चित्रांगदा बोली, ‘ हे देव!  आप तो रुप गुण तथा प्रेम के देवता है। मेरे लिए आप उसके दिल में  प्रेम नहीं जगा सकते? मैं आपसे प्रार्थना करती हूं कि मेरी इच्छा  पूरी किजिये ।
कामदेव बोले, ‘ देवी! स्त्री आप ध्यान में रखे आप आपनी प्रकृति से ही पुरूष का दिल जीत सकती है उसके लिए किसी बनावटी रुप रंग की जरूरत नही । आप जैसी है वैसे ही विवाह प्रस्ताव लेकर जाइए ।’ पर चित्रांगदा हठ पर अड़ गई ।
‘ ठीक है देवी लेकिन ये कोशिश आप कर ले । सफल ना हुई तो मैं करूगा।’
चित्रांगदा को स्त्री रूप मिला,  खुद को देख विस्वास नहीं हुआ कि वह इतनी सुन्दर है । उसकी सुन्दरता उसे विश्वास दिला रही थी कि वो अपराजित राजकुमार उसे ना नहीं कहेगा । देवी रती से वह कन्या की तरह रहना,  मुस्कराना और इठलाना सीख रही थी ।
स्त्री रूप मे ,  सुंदर वस्त्र धारण कर और गहने पहनकर राजकुमारी चित्रांगदा अर्जुन के पास गई ।
अर्जुन, ‘प्रणाम देवी!  आप कौन है? ‘
चित्रांगदा खुश हुइ कि अर्जुन उसे नही पहचान पाया ।
चित्रांगदा, ‘ पहले तुम आपना परिचय दो राजकुमार । कौन हो तुम और मणिपुर किस प्रयोजन से आए हो?’
अर्जुन, ‘ मैं कुन्ती पुत्र अर्जुन हूँ,  इन्द्रप्रस्थ का राजकुमार । इन्द्रप्रस्थ के महाराज युद्धिष्थिर की तरफ से मणिपुर मित्रता का संदेश  लेकर आया हूँ ।’
चित्रांगदा, ‘ अर्जुन,  कितना सुंदर नाम है! मणिपुर की राजकुमारी अर्जुन का मणिपुर मे स्वागत करती है । हे अर्जुन! मुझे तुमसे प्रेम है। तुम्हारे सामने मैं विवाह का प्रस्ताव रखती हूं । ऐसे मणिपुर और इन्द्रप्रस्थ के बीच अटूट रिस्ता बन सकता है ।’
अर्जुन सोच मे पड़ गया ।
चित्रांगदा ,’ किस सोच मे पड़ गए,  कुन्ती पुत्र अर्जुन ?’
अर्जुन, ‘ मैंने भी यही सोचा था राजकुमारी, लेकिन  मैं राजकुमारी चित्रांगदा को अपना दिल दे चुका हूं । उनकी जैसी वीर कन्या मैंने कही नही देखी । उनका योद्धा रूप और तीरंदाजी कला ने मेरे हृदय में अलग स्थान बना लिया है । मै आपके विवाह प्रस्ताव को नहीं  स्वीकार सकता । मुझे क्षमा करें देवी ।’
राजकुमारी चित्रांगदा अर्जुन को देखती रह गई । उसे विश्वास नही हो रहा था कि अर्जुन उसके योद्धा रूप से प्रेम करेगा ।
राजकुमारी, ‘ मित्रता के साथ क्या आप चित्रांगदा से विवाह प्रस्ताव मणिपुर नरेश के सामने रखेंगे ?’
अर्जुन, ‘हा देवी,  मेरा मकसद आपका दिल दुखाना नही है पर मै विवश हू।’
स्त्री वेस धारी राजकुमारी चित्रांगदा बिना कुछ कहे वहा से चल दी। उसकी आंखे खुल गई थी । उसे अपने पुरूष  योद्धा रूप पर गर्व हो रहा था ।उसे कामदेव से अपना रूप वापस चाहिए था ।
चित्रांगदा ने कामदेव का आह्वान किया । कामदेव रती के साथ प्रकट हुए ।
राजकुमारी चित्रांगदा, ‘ आप सही थे देव! स्त्री अपनी प्रकृति से ही पुरूष का दिल जीत सकती है । कुन्ती पुत्र अर्जुन को मेरे योद्धा रूप से प्रेम करते है। उन्होंने मेरे योवन स्त्री की कोमलता को ठुकरा कर मेरे पुरूष वेश को चाहा है। मुझे मेरा वो रूप वापस चाहिए ।’
कामदेव ने तथास्तु कहा । राजकुमारी चित्रांगदा को अपना योद्धा का वेश फिर से मिल गया ।
‘देव , अगर अर्जुन से विवाह हुआ तो मैं अर्जुन से पहले आपको धन्यवाद दूंगी।’ , चित्रांगदा ने कामदेव से कहा ।
अर्जुन ने मणिपुर नरेश के सामने मित्रता के साथ  योद्धा राजकुमारी चित्रांगदा से विवाह प्रस्ताव रखा जिसे महाराज ने स्वीकार कर लिया,  फिर दोनो का विवाह हो गया ।

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