जहाँ एक ओर रंग-बिरंगे कागज़ के टुकड़ो के
पीछे भागती इस अंधी भीड़ को देखकर,
सब कुछ इतना उलझा-उलझा सा लगता है।
वहीँ पेचेदगियों से भरे उस ऊन को गोले को,
‘माँ’ के हाथों में करतब खाता हुआ देखकर,
सब कुछ जैसे कितना सुलझा-सुलझा सा लगता है।।

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