आप सब को याद होगा आपका पहला स्कूल, पहली क्लास, पहली टीचर, पहला प्यार और भी बहुत सारी पहली चीजें। क्या आपको याद है आप ने सबसे पहले बुरा बनने की शुरुआत कब की? किचेन से मिल्क पाउडर चुराने और गली क्रिकेट में बेईमानी से किसी को आउट करवाने को छोड़ के; क्या आपको याद है की आपने पहली बेईमानी कब की थी? सच की बेईमानी…?
मुझे याद है…
सुबह-सुबह  कदम जल्दी-जल्दी बढ़ाते हुए मेरे मन में दो तरह के विचार चल रहे थे। मेरा हाथ जेब में पड़े एक बीस रुपये के नोट को बार बार छू कर उसकी मौजूदगी और फटे होने के एहसास को पुख्ता कर रहा था
ये नोट मुझे एक दिन पहले स्कूल जाने के रास्ते में मिला था, फटा हुआ… दो टुकड़ों में। फेविकोल और थोड़े दिमाग की मदद से मैंने चिपका तो लिया था, लेकिन फिर भी ऐसे मामलों में (बेईमानी के मामलों में) मेरे गौण अनुभव की झलक उस बेतरतीब चिपके हुए नोट में दिख रही थी। तो ऐसी हालत में कोई बेवकूफ ही उस नोट को अच्छी तरह देखने के बाद भी ले लेता, और मुझे एक ऐसे ही बेवकूफ की तलाश थी।
खैर मैं संक्षेप में बता दूं की मैं ऑटो से स्कूल जाया करता था, और अभी स्कूल जाने के लिए ही निकला था। ऑटो वाला दस रुपये लेता था। इस हिसाब से आने जाने के मिला के मुझे हर दिन बीस रुपये मिलते थे। तो ऊपर से बोनस रूपी फटा हुआ वो बीस का नोट मेरे लिये बहुत ज्यादा तो नहीं था, लेकिन फिर भी, कुछ नहीं से कुछ सही… अगर मैं उसे चला पाता तो।
दिल में भारी कश्मकश चल रही थी – कहीं मैं गलत तो नहीं कर रहा? एक गरीब ऑटो वाले का नुकसान हो जायेगा… क्या करूँ? क्या करूँ? क्या ये सही है?
बच्चा ही तो था मैं, दिल अभी उतना गन्दा नहीं हुआ था और धूल की पतली सी जमी हुई परत के पीछे से मैं इसकी आवाज़  सुन सकता था… साफ-साफ।
मैं सड़क पर पहुंच कर ऑटो का इंतज़ार करने लगा, खड़ा हो कर में आराम से उस नोट के “नतीजे” पर पहुंच सकता था, पर मौका नहीं मिला। एक मिनट से भी  कम समय में एक ऑटो सामने आ कर खड़ा हो गया। ताज्जुब की बात नहीं है, गुड़गांव के सड़कों पर या तो आस-पास के गांवों के लठैतों की गुंडागर्दी चलती है, या फिर बिहार और यूपी के ड्राइवरों के ऑटो चलते हैं।
तो आपको गुड़गांव के मॉल्स से बाहर निकलने के बाद सड़क पर या तो लात-घूंसों वाली लड़ाइयां दिखेंगी या काले-पीले-हरे रेंगते हुए ढेर सारे ऑटो रिक्शा।
मैंने ऑटो के ड्राइवर को देखा, कोई बीस-इक्कीस साल का नौजवान था, हालत इतनी दयनीय तो नहीं थी, और कपड़े भी ठीक-ठाक ही पहन रखे थे। लेकिन वो बन्दा दुनिया के सारे काम छोड़ कर ऑटो चला रहा था, तो दया आना लाज़मी था।
अंदर बैठने के बाद मैंने ध्यान दिया की वहां मुझे मिला कर सिर्फ तीन लोग ही थे, तो अगर मैं अपना वो फटा हुआ नोट इस्तेमाल करता हूँ तो उस ऑटो वाले को बीस रुपये का नुकसान हो जायेगा, और इस ट्रिप में उसे सिर्फ दस रुपये की कमाई होगी। नहीं… मैं अपने स्वार्थ के लिए किसी के पेट पर लात नहीं मार सकता, ऐसा ही कुछ बकवास शायद मेरे दिमाग मे चल रहा होगा!
बैठे-बैठे एक बार फिर मेरा हाथ जेब मे पड़े उस नोट को छू कर देख रहा था, उसी जेब में दस रुपये के दो नोट भी थे जिनका इस्तेमाल कर मैं इस खुद के बनाये हुए धर्म संकट से मुक्त हो सकता था। मुझे डर भी लग रहा था, कहीं वो नोट लेने से मना ना कर दे… फालतू में ही फजीहत हो जायेगी।
लेकिन रिस्क लेने में हर्ज़ क्या है? उसने नोट ले लिया तो चांदी हो जायेगी। वैसे भी कहते हैं ना- “डर के आगे जीत है!”
और सबसे बड़ी बात ये कि फटे हुये नोट का इस्तेमाल ना कर के मैं भारत के राजकोष को बीस रुपये का चूना लगा दूंगा। स्वाभाविक है कि इस्तेमाल न किये जाने पर वो नोट अर्थव्यवस्था से बाहर हो जायेगा और भारत सरकार को बीस रुपये का नुकसान हो जायेगा।(अब नौवीं का छात्र कोई अर्थशास्त्री तो होता नहीं है)। नहीं…इस तरह तो मैं उन भ्रष्ट नेताओं की तरह बन जाऊंगा जो हर दिन हमारे देश के हज़ारों करोड़ लूट लेते हैं। भले ही ये बीस रुपये हों, लेकिन बेईमानी तो बेईमानी होती है… छोटी हो या बड़ी।
तो देश को धोखा देने से अच्छा है की एक गरीब ऑटो वाले को धोखा दिया जाये।
हर तरह की दलीलें दे दे कर मेरा दिमाग किसी एक ठोस निर्णय पर पहुंचना चाहता था। नोट चलाऊँ या ना चलाऊं…?
खैर एक ट्रैफिक लाइट ने मेरे ख्यालों को भी रेड लाइट दिखा दिया। ड्राइवर ऑटो रोक कर इधर-उधर देखने लगा, फिर अकस्मात ही उसे पता नहीं क्या सूझा, पीछे पलट कर उसने हम सब से किराया मांगा। मेरे पस तय करने के लिए बिलकुल भी समय नहीं था। मेरे सह यात्री अपने-अपने बटुओं मे से किराया निकालने लगे। अपनी जेब में डाल कर मैं फिर से उधेड़बुन मे लग गया, लेकिन तभी भगवान ने मेरी मदद की।
मेरे बगल में बैठी औरत ने अपने पर्स में से मेरे नोट जैसी हालत वाला एक दस का नोट निकाला, ये नोट घिस-घिस कर पुराना हो गया था, इसके एक कोने में टेप भी चिपका हुआ था।
औटो वाला बिना कुछ कहे वो नोट हाथ में रख के मेरी तरफ देखने लगा। सोच-सोच के मैं जरा थक गया था, तो इस बार बिना ज्यादा सोचे वो बीस का नोट मैंने उसे दे दिया।
आत्मग्लानि से मैं मुक्त हो चुका था, अब बस वो ऑटो वाला नोट चुप-चाप ले के बेइज्जती से भी बचा देता तो जान छूटती।
उसने नोट को खोल के बड़े ध्यान से देखा, और शायद मेरी फेविकोल वाली चालाकी समझ कर मुस्कुराया। मुझे लगा की अब तो चोरी पकड़ी गयी, इसलिए मैंने माफी मांगने की तैयारी कर ली, सॉरी ही तो बोलना होता है… बस।
लेकिन उम्मीद के विपरीत उसने नोट मोड़ कर अपने पास रख लिया और बचे हुए पैसे यानी एक दस का नोट मोड़कर  मुझे पकड़ा दिया। मैंने उस नोट को देखा, ये उसी औरत वाला फ़टा हुआ नोट था… फटा  हुआ… टेप चिपका हुआ। मैं जानता था और आप सब जानते हैं की नोट बदलने की मांग करना बेवकूफी थी।
तो मुझे मेरी बेईमानी का फल वापस मिल गया, दस रुपये कम कर के। मुझे दस रुपये कम कर के और उस औरत को कुछ नहीं।
शायद इसीलिए लोग बेईमानी करने से नहीं चूकते क्योंकि इसकी सज़ा (जो शायद भगवान, अल्लाह, या God देते हैं)
इतनी तल्ख नहीं है।”
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