एक राजा ने अपनी बुद्धि का प्रयोग कर सभी को उनके गुणों के अनुरूप पद प्रदान किया।

 

आज राजा इंद्र युद्ध में विजयी होकर अपने राज्य की तरफ लौट रहे थे, उनके चेहरे पर ख़ुशी तो झलक ही रही थी पर उसके साथ-साथ उनके चेहरे पर उनकी चिंता भी झलक रही थी। कोई भी राजा की इस चिंता के बारे में किसी भी व्यक्ति को कुछ पता न था। राजा इंद्र अब वृद्ध हो चुके थे। इस युद्ध में राजा ने अपना पराक्रमी सेनापति खो दिया था। राजा इंद्र एक वीर और पराक्रमी योद्धा थे और उन्होंने अपनी जिंदगी में बहुत से युद्ध जीते थे और बड़े-बड़े वीरो को धूल चटाई थी। राजा इंद्र की जिंदगी में उन्हें एक ख़ुशी नही मिली थी, राजा इंद्र की कोई भी संतान नही थी। राजा को जिंदगी में एक ही दुःख सताता रहता था। आज के युद्ध में राजा ने अपना सबसे प्रिय और पराक्रमी सेनापति भी खोया दिया जिससे वह युद्ध जीतकर भी खुश न थे। राजा राजमहल पहुँचे।

कई दिन बीत गए पर राजा का किसी भी काम में ध्यान नही लग रहा था, राजा को अपने राज्य की चिंता हो रही थी कि उनके बाद इस राज्य को कौन संभालेगा? बस राजा को यही चिंता रहती क्योंकि राजा की उम्र हो चुकी थी और अब उनकी जिंदगी का भी कुछ पता न था। राजा को अपनी प्रजा बहुत प्रिय थी और वह उन्हे किसी भरोसेमन्द राजा को अपनी गद्दी पर बिठाना चाहता था। काफी दिन राजा ने बहुत सोचा और नए राजा के लिए उपयुक्त व्यक्ति की तलाश की पर कुछ निर्णय नही हो पाया। कुछ दिनों में राजा ने सोच-विचार कर के अपने दरबार में से तीन लोगो को इस कार्य के लिए उपयुक्त माना पर उनमे से एक का चुनाव करना था और इसके लिए राजा ने उनकी परीक्षा लेने की सोची। अगले दिन राजा ने उन्हें अपने पास बुलाया, उनके नाम सूर्यभान,वीरसिंह और युवराज थे। अगले दिन महाराजा इंद्र ने इन्हें राजदरबार में सभी से अवगत कराया, तत्पश्चात महाराजा इंद्र ने तीनो प्रतिद्वंद्वी को निर्धारित स्थान पर बुलाया।

महाराजा के आदेश पर तीनो प्रतिद्वंदी को सारे नियमो से अवगत कराया। इन तीनो के बीच प्रतियोगिता का आयोजन होने वाला था। इस प्रतियोगिता में सभी को लाल पहाड़ के ऊपर फहराये हुए अपने-अपने झंडे लेकर आना था, यह पहाड़ी राज्य के बिल्कुल सामने नदी,जंगल,मैदान और खाई पार करने के बाद थी। सभी प्रतिभागी को राजा ने सभी अस्त्र-शस्त्र व अन्य आवश्यक वस्तुओं को देकर विदा कर दिया। तीनो ने राजा को प्रणाम कर उनसे आज्ञा मानी और फिर वहाँ से तीनो घोड़े पर सवार होकर निकल गए। शुरू से ही तीनो प्रतिद्वंद्वी रफ़्तार से अपने घोड़े दौड़ाये जा रहा थे, तीनो में कड़ी टक्कर हो रही थी। कुछ ही देर में तीनो में अपने राज्य को आराम से पार कर लिया। अब तीनो के सामने एक छोटी सी नदी आ गयी और तीनो ने बड़ी ही चतुराई से वह नदी आसानी से पार कर ली। धीरे-धीरे अब वह जंगल की तरफ बढ़ते जा रहे थे और अब तीनो के घोड़े एक ही पगडण्डी पर दौड़ रहे थे। अब तीनो एक दूसरे से आगे-पीछे हो चुके थे। सबसे आगे वीरसिंह का घोड़ा ही दौड़ रहा था और उससे कुछ दुरी पर सूर्यभान का घोड़ा दौड़ रहा था और उससे कुछ पीछे युवराज था। कुछ ही देर में वीरसिंह के सामने एक भिखारी आ गया और वीरसिंह को अपना घोड़ा रोकना पड़ गया।

उस भिखारी ने कहा,” महाराज मेरी मदद कर दो, मैंने पाँच दिन से कुछ नही खाया है,कृप्या करके मुझे कुछ खाने को दे दो।” वीरसिंह ने उस भिखारी को ठोकर मार दी और आगे बढ़ गया, उसे तो सिर्फ अपनी जीत प्यारी थी और इसीलिये उसने अपनी पूरी जी जान लगा दी। अभी कुछ ही वक्त हुआ था कि वहाँ सूर्यभान भी आ गया और भिखारी उसके सामने भी आ गया। भिखारी ने इस बार सूर्यभान के सामने भी यही बात दोहराई। कुछ पलो के लिए तो सूर्यभान के मन में उस भिखारी के प्रति दया आ गयी और उसने अपने खाने की पोटली में से एक रोटी निकाल कर दे दी।

जबतक सूर्यभान अपने घोड़े पर सवार हुआ उतने में भिखारी खाने के लिए और खाना माँगने लगे पर अब सूर्यभान ने मन ही मन सोचा, अगर वह अपना सारा खाना इसे दे देगा तो इतने बड़े रस्ते में उसका गुज़ारा कैसे चलेगा पर उसे उस भिखारी पर दया भी आ रही थी, फिर उसे एक विचार आया कि अभी युवराज पीछे है और वह भी अगर थोड़ा खाना इस भिखारी को दे देगा तो इस भिखारी का पेट भर जायेगा। फिर सूर्यभान ने भिखारी को पीछे की तरफ इशारा करके आगे निकल गया। भिखारी ने उसके पीछे देखा तो एक और युवक घोड़े पर आ रहा था। जैसे ही युवराज वहाँ पहुँचा भिखारी इस बार भी उसके सामने आ गया और फिर से अपनी भूखे होने वाली बात दोहराई। युवराज को भी उसके प्रति दया आ गयी और उसने दो रोटी  भिखारी को दे दी और उसके खाने तक का इंतज़ार करने लगा। कुछ ही पलो में भिखारी ने दोनों रोटी चट कर ली और अब भिखारी और खाना माँगने लगा और युवराज ने उसे दो रोटी और दे दी। भिखारी सच में ही कई दिनों का भूखा प्रतीत हो रहा था क्योंकि इस बार भी उसने कुछ ही पलो में उसे भी खा लिया और फिर खाना मांगने लगा। इस बार युवराज ने अपना सारा खाना उसको दे दिया और चूँकि वह अबतक बहुत पिछड़ चुका था इसीलिए बिना देरी किये वहाँ से निकल गया। अबतक वीरसिंह और सूर्यभान ने काफी दुरी पार कर ली थी और अब वह जंगल के निकट थे। वहाँ वह दोनों अपने भोजन के लिए रुक गए। दोनों ने अपने-अपने लिए अलग-अलग उपयुक्त स्थान ढूंढ लिया और भोजन आरम्भ कर दिया। सूर्यभान ने अपना भोजन जल्द खत्म किया और जंगल में प्रवेश कर लिया। उधर जबतक वीरसिंह भोजन करता तबतक युवराज भी वहाँ पहुँच गया और उसे देख वीरसिंह जल्दी से वहाँ से रवाना हो गया।

युवराज पर करने को कुछ तो था नही इसीलिए वह बिना रुके आगे बढ़ गया। जंगल में सबसे आगे अब सूर्यभान था। अभी जंगल में  कुछ ही देर हुई थी कि सूर्यभान को कुछ लुटेरो ने घेर लिया, यूँ तो सूर्यभान बहुत ही बहादुर था पर वह जानता था कि वह अकेला इतने सारे लोगो के साथ नही लड़ सकता और अब वह अपने बचने के लिए युक्ति सोचने लगा और कुछ देर बाद कहा,”तुममे हिम्मत है तो मेरे दोस्तों से जीतकर दिखाओ वो अभी कुछ ही देर में यहाँ आने वाले है।” ऐसी चुनौती के लिए लुटेरे भी तैयार हो गए और कुछ ही देर में दोनों वहाँ आ गए और फिर तीनो ने मिलकर सभी लुटेरो को मार गिराया और आगे बढ़ गए।

अब फिर से सूर्यभान सबसे आगे निकल गया और कुछ ही देर में उसने जंगल पार कर लिया और अब उसके सामने गुफा थी, पूरी गुफा में अँधेरा था पर इसके अलावा कुछ और रास्ता न था। इस गुफा में अब घोड़े को नही लेकर जाया जा सकता था और इसीलिए उसने अपना घोड़ा वही छोड़ दिया और गुफा में हाथो और पैरो के सहारे जाने लगा। गुफा में बहुत से कंकर थे और वो उसे चुभने लगे। इस दर्द से सूर्यभान को बहुत तकलीफ हुई और वह बहार निकल आया और फिर उसने एक युक्ति लगाई और कुछ मजबूत पत्तो को उसने बेल के सहारे दोनों हाथो में बांध लिया और बड़ी ही आसानी से गुफा पार कर लिया।

अब इसी गुफा में युवराज पंहुचा और वह उन कंकरों में भी उस गुफा से जाने लगा और कंकरों को दोनों तरफ करता रहा ताकि जो भी बाद में आये उसे कोई तकलीफ न हो। कुछ ही देर में उसने और फिर वीरसिंह ने भी वह गुफा पार कर ली। अब उन तीनो के सामने एक खाई थी और इसके इंतज़ाम के लिए वहाँ तीन रस्सियाँ रखी हुई थी और तीनो ने उसके सहारे खाई भी पार कर लिया और फिर तीनो ने पहाड़ पर चढ़ाई की और अपने-अपने झंडे लेकर वापिस चल पड़े। तीनो अपने घोड़े तेज़ी से दौड़ाने लगे, तीनो ही प्रतियोगिता जीतना चाहता थे। अंत में तीनो निर्धारित स्थान पर एक साथ पहुँचे। अब सबको यह समझ नही आ रहा था कि राजा इंद्र किसे अपना उत्तराधिकार घोषित करेंगे। राजा ने बिना देरी किये युवराज को तत्काल का युवराज और भविष्य का महाराज घोषित किया जबकि वीरसिंह को राज्य का सेनापति और सूर्यभान को राजा का सलाहकार घोषित किया।

लोगो को राजा के इस निर्णय का कारण समझ नही आ रहा था। राजा ने इसका कारण बताया, राजा का कर्तव्य शत्रुओ को मारने के साथ-साथ अपनी प्रजा के हित में कार्य करना भी होता है और यह सिर्फ युवराज ने किया था उन्होंने भिखारी को खाना खिलाकर व गुफा में कंकर साफ़ कर के दुसरो का हित किया और शत्रुओं से लड़कर अपनी वीरता का परिचय दिया जबकि वीरसिंह ने केवल अपनी वीरता का परिचय दिया था। सूर्यभान ने हर समय अपनी बुद्धि का प्रयोग कर अपने उद्देश्य को पूरा किया। इसीलिए इन तीनो को उनकी योग्यता के अनुरूप पद दिए गए। अब सब लोगो को राजा के चुनाव का कारण समझ आ गया था।…

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