“मन के हारे हार है, मन के जीते-जीत”
इसी बात पर खड़ी उतरती है यह कहानी
किसी भी समस्या का हल युद्ध से नही होता, हर समस्या युद्ध के बिना ही हल की जा सकती है। जरूरत है नज़रिया बदलने की ,अपने साथ सबके हित में सोचने की।

 

पुराने समय की बात है, रामपुर नाम का एक छोटा सा राज्य था, वहाँ के राजा का नाम वीरसिंह था। राजा वीरसिंह बहुत ही न्यायप्रिय राजा था। राजा अपनी प्रजा और अपने राज्य का लालन पालन बहुत ही बढ़िया तरीके से किया करता था। वहां की जनता भी राजा को बहुत मानती थी , वह राजा को भगवान समान मानते थे। वहाँ चारो तरफ खुशहाली थी। वह राज्य ऐसा लगता था कि मानो स्वर्ग धरती पर आ गया हो , हर तरफ खुशहाली और हरियाली थी। वहां प्रकृति की छटा देखते ही बनती थी। नदी पहाड़,जंगल,मैदान सभी कुछ तो वहाँ प्रकृति ने दिया था। उसी जमाने में एक विशाल राज्य था विजयपुर। विजयपुर के राजा का नाम इंद्रजीत था।

विजयपुर का राजा धन, शक्ति से समृद्ध था। चारो ओर राजा की ख्याति फैली हुई थी। यह राज्य रामपुर से काफी दूर था। विजयपुर के राजा की एक पुत्री थी, जिसका नाम परी था। राजकुमारी का जैसा नाम वैसे ही उसके गुण थे। राजकुमारी परी बेहद खूबसूरत व सर्वगुण संपन्न थी। राजकुमारी का एक ही गुण बुरा था, वो था घमण्ड। राजकुमारी को अपने गुणों और राज्य की राजकुमारी होने का बहुत घमण्ड था। एक बार की बात है राजकुमारी अपनी सहेलियो के साथ अपने राज्य से भ्रमण के लिए निकली। भ्रमण करते करते बहुत दूर निकल गई उन्हें पता भी नही चला कि उन्होंने अपने राज्य के अलावा भी कई राज्य पार कर लिए थे, अब वो सब रास्ता भटक चुके थे।

धीरे-धीरे वो आगे बढ़ते रहे और रास्ता पता करने की कोशिश करने लगे। परन्तु उन्हें रास्ता नही मिला और वो जंगल में पहुँच गए । यह जंगल रामपुर राज्य में था। सभी आगे बढ़ते जा रहे थे और अब वो सब बहुत डरे हुए थे। जैसे तैसे उन्होंने जंगल को भी पार किया। उसके बाद जो उन्होंने दृश्य देखा उससे उनकी आँखे फटी की फटी रह गयी। वहाँ का मनोरम दृश्य उन्हें भा गया था। विशाल पर्वत से निकलती हुई नदी, झरने, मैदान और पक्षियों की चहचहाने की आवाज़ उस दृश्य की सुंदरता बढ़ा रही थी। राजकुमारी को ऐसा लगा की बस वही ठहर जाये। राजकुमारी यह सब देखकर अपना सारा गम भूल गई और प्रकृति का आनन्द लेते लेते आगे बढ़ने लगी। उसके मन में इस राज्य को जानने के लिए जिज्ञासा होने लगी। काफी आगे जाने के बाद राजकुमारी को लोग दिखाई देने लगे थे। फिर राजकुमारी ने एक औरत से राज्य का नाम पूछ ही लिया । औरत ने उसे बताया इस राज्य का नाम रामपुर है और यहा के राजा का नाम वीरसिंह है। औरत ने फिर राजकुमारी से उनका परिचय माँगा। राजकुमारी ने अपना परिचय विजयनगर की राजकुमारी परी के रूप में दिया। फिर राजकुमारी ने कहा कि वे अपना रास्ता भटक गयी है उन्हें मदद की आवश्कयता है। फिर वह औरत राजकुमारी को राजमहल तक ले गयी ताकि राजा वीरसिंह उनकी मदद कर सके। राजमहल देखते ही राजकुमारी आश्चर्यचकित हो गयी।

महल बेहद शानदार था चारो तरह चकाचौन्ध, पूरे महल में रौनक थी। राजकुमारी ने सोचा इतना बड़ा राज्य होने के बावजूद ऐसा महल उनका भी नही है और इस राज्य में इतना शानदार महल। उसके बाद राजा वीरसिंह ने उनका स्वागत किया और अतिथि की तरह सत्कार किया और अपने सैनिको को राजकुमारी को सुरक्षित विजयनगर पहुचाने को कहा।

शीघ्र ही सैनिको ने सुरक्षित उन्हें तथा उनकी सहेलियो को विजयनगर पहुँचा दिया। राजकुमारी केवल उसी राज्य के बारे में सोच रही थी। अपने राज्य पहुँचने के बाद राजकुमारी परी ने अपने पिता से भेंट की और सारा वर्णन सुनाया, फिर मांग की कि उन्हें अब वह पूरा राज्य व राजमहल उन्हें चाहिए। यह बात सुनकर राजा इंद्रजीत सोच में पड़ गए। आज तक राजा ने राजकुमारी परी की सारी ख्वाहिश पूरी की थी, क्योंकि वह राजा की इकलौती पुत्री थी, परन्तु आज राजकुमारी की मांग विचित्र थी। काफी सोच विचार करने के बाद राजा ने राजकुमारी को वचन दे दिया। राजा इंद्रजीत ने अपने खास मंत्रियो को अपने पास बुलाया और इस समस्या के बारे में बताया। काफी देर चर्चा के बाद राजा इंद्रजीत ने निर्णय लिया और अपने राजदूत को बुलाया और एक सन्देश लिखवा कर रामपुर जाने को कहा।

राजदूत कुछ सैनिको को साथ लेकर रामपुर राज्य के लिए निकल गया। लंबी यात्रा के बाद राजदूत रामपुर में राजा के राजमहल तक पहुँच गया । राजमहल पहुँचने पर राजा वीरसिंह ने अतिथि सम्मान दिया। राजदूत ने राजा को प्रणाम करके सन्देश दे दिया। राजदूत को अतिथि गृह में ठहराया गया और अच्छे से सेवा भाव से सभी सुख सुविधा प्रदान की गई। इसके तत्पश्चात राजा वीरसिंह ने सन्देश पढ़वाया। सन्देश में यह लिखा था कि राजा इंद्रजीत राजा वीरसिंह से मित्रता चाहता है, राजा इंद्रजीत ने रामपुर राज्य की मांग की थी और राजा इंद्रजीत इसके बदले दोगुना बड़ा राज्य देने को तैयार थे और इसके साथ धन दौलत सभी वस्तुऐ भी देने को तैयार थे।

इतना सब सुनने के बाद राजा वीरसिंह दुखी हो गए। उन्होंने तुरन्त एक सन्देश लिखवाया जिसमे यह लिखा गया था कि राजा वीरसिंह मित्रता के लिए सदैव तैयार है परन्तु अपनी जान से भी प्रिय राज्य को किसी भी कीमत पर नही दे सकते। यह सन्देश लिखवा कर अगले ही दिन विजयपुर के राजदूत को सन्देश के साथ विधिवत विदा किया गया। तत्पश्चात राजा वीरसिंह ने अपना दरबार लगवाया। सभी मंत्री और दरबारी सभा में उपस्थित हुए। राजा ने फिर सबके सामने पूरी समस्या रखी तथा अपना फैसला बताया। राजा ने सभी को हर तरह की परिस्तिथि से निपटने के लिए तैयार रहने को भी कहा। उधर राजदूत सन्देश लेकर विजयनगर पहुँचा। राजा ने सन्देश पढ़ने को कहा। सन्देश सुनकर राजा को दुःख हुआ क्योंकि उन्होंने अपनी पुत्री को वचन दे दिया था और अब वो किसी भी तरह से पीछे नही हट सकते थे। तत्पश्चात राजा ने दूसरा सन्देश लिखवाया और फिर से राजदूत को सन्देश ले जाने को कहा। राजदूत सन्देश लेकर कुछ सैनिको के साथ निकल पड़ा। राजा इंद्रजीत ने सभी मंत्रियो को पास बुलाया और युद्ध के लिए तयारी करने को कहा। सभी को पूरी बात बता कर योजना बनाने को कहा। काफी लंबी यात्रा के बाद राजदूत रामपुर पंहुचा और पुनः सन्देश राजा को प्रणाम करके उन्हें सौंप दिया।

राजा ने पुनः राजदूत को पूरे अतिथि सम्मान के साथ ठहराया। राजा ने तत्पश्चात सन्देश पढ़वाया। सन्देश में लिखा था कि राजा वीरसिंह आप अपना राज्य हमे नही सौपेंगे तो हम युद्ध में आपको हराकर आपका राज्य जीतेंगे और तब जो हम अभी तुम्हे इसके बदले विशाल राज्य दे रहे है वो भी नही मिलेगा इसीलिए आप पुनः विचार करे और संधि करे। अगर आप ऐसा नही करते है तो युद्ध के लिए तैयार हो जाये। यह सुन के राजा वीरसिंह चिंतित हो गए और उन्होंने ने तत्काल सभा बुलाई।

सभा में उन्होंने सन्देश का मुद्दा रखा और कहा हम अपना राज्य किसी को नही दे सकते। युद्ध की बात सुनकर मंत्री क्रोधित हो गए और राजदूत को मारने के लिए खड़े हो गए। परन्तु राजा वीरसिंह ने उन्हें शांत करवाया और फिर समझाया की वो अभी हमारे अतिथि है, अतिथि के साथ हम कभी भी ऐसा नही कर सकते और वो तो केवल अपना फ़र्ज़ निभा रहे है, अपनी राजा की आज्ञा मान कर। तब जाकर मंत्री शांत हुए। तत्पश्चात काफी देर चर्चा चली और राजा वीरसिंह ने युद्ध का विकल्प चुना। इसके बाद राजा ने सन्देश लिखवा कर राजदूत को अपने राज्य वापिस भेज दिया। राजदूत सन्देश लेकर अपने राज्य पंहुचा।

राजा ने सन्देश पढ़ने के लिए कहा। सन्देश में यह लिखा था कि राजा वीरसिंह अपने प्राणों की बलि दे देगा परन्तु अपना राज्य नही दे सकता। यह सुनकर राजा ने कहा जिसका अंदेशा था वही हुआ। राजा ने तुरंत सभी मंत्रियो सहित सेनापति को बुलाया और रामपुर पर आक्रमण की योजना बनायीं। वही राजा वीरसिंह भी चिंतित थे उन्होंने पूरे राज्य में घोषणा करा दी कि विजयपुर से युद्ध होने को है जो जिस तरह मदद कर सकता है वैसे करें।

राजा को गुप्त सूत्रो से पता चला कि राजा इंद्रजीत अपने एक लाख सैनिको के साथ युद्ध करेगा और युद्ध दो से तीन दिन के अंदर शुरू हो जायेगा। राजा वीरसिंह ने सभा बुलाई और युद्व रणनीति बनाने को कहा क्योंकि रामपुर के पास केवल दस हज़ार सैनिक थे तथा अस्त्र शस्त्र भी विजयपुर के मुकाबले बहुत कम थे। राजा वीरसिंह अच्छे से जानते थे कि अगर युद्व हुआ तो वह निश्चित ही हार जायेंगे परन्तु उनके पास कोई दूसरा विकल्प नही था। अतः युद्व की रणनीति पर विचार हुआ।

काफी चर्चा के बाद यह तथ्य सामने आया कि विजयपुर की सेना को रामपुर आने में दो से तीन लगेंगे और अगर इन दो से तीन दिन में हमने उनकी अधिकतम सेना खत्म कर दी तो युद्ध में अच्छे से मुकाबला कर पाएंगे। फिर उन्होंने इस समस्या पर विचार किया कि उनकी सेना कैसे खत्म की जाये। काफी देर तक चर्चा चली तब भी निर्णय नही हो पाया। तत्पश्चात यह निर्णय लिया गया कि सभी ग्राम के मुखिया व अन्य प्रमुख व्यक्तियों की सभा तत्काल बुलाई जाये। सभा का आयेजन हुआ तथा राजा ने सबको सुझाव देने को कहा। काफी समय के सोच विचार के बाद कुछ सुझाव चुने गए जो काफी बेहतरीन थे। तत्पश्चात युद्व की योजना बनाई गयी। अगले दिन पूरी तैयारी के साथ पांच सौ सैनिको के समूह और कुछ होशियार व्यक्तियो के समूह को घोड़े के साथ भेजा गया। सैनिक और लोग  कुछ घंटो में अपने राज्य से निकलकर बीच जंगल में पहुँच गए जो की उनका निर्धारित स्थान था। और वही एक और समूह को जिसमे पांच सौ सैनिक व एक हज़ार व्यक्तियो को उनके हथियार और औज़ार के साथ भेजा गया। वो भी कुछ घंटो बाद अपने निर्धारित स्थान पर पहुँच गए। उनका निर्धारित स्थान मैदानी इलाका था। उसी दिन एक तीसरे समूह को भी भेजा गया। वो भी अपने निर्धारित स्थान पर पहुँच गए। तीनो समूह अपने अपने निर्धारित स्थान पर पहुँच गए और अपने काम में लग गए। विजयनगर से भी सभी अस्त्र शस्त्र और एक लाख सैनिको के साथ राजा इंद्रजीत रवाना हो गए।

उनकी सेना भी कई समूहों में बँटी हुई थी और वो सेना अलग अलग समय पर रवाना हुए। दूसरे दिन राजा इंद्रजीत की सेना की एक टुकड़ी जंगल पहुँच गयी । वहाँ रामपुर का प्रथम समूह वृक्षों पर छुपा हुआ इंतज़ार कर रहा था, तुरन्त सेना आते ही होशियार लोगो ने चलाकी से मिर्च के कणों के मिश्रण को हवा में उड़ा दिया, जिससे ये कण सैनिको की आँख में गए और उनकी आँखों में जलन होने लगी और वे जल ढूंढने लगे। वही कुछ लोग भेष बदल कर लकड़हारे के रूप में थे उन्होंने उन्हें पास के एक तालाब का रास्ता बता दिया परन्तु ये नही बताया कि उसके रस्ते में बड़ा सा दलदल है। तत्पश्चात सैनिक तालाब की ओर भागे और उन्होंने जल्दबाज़ी में दलदल नही देखा और अधिकतर सैनिक वही फंस गए और कुछ सैनिक जो बच गए थे, उन्हें छुपे हुए रामपुर के सौनिको ने मार दिया और हथियार छीन लिए। और फिर से सैनिक और लोग हथियारों के साथ अपने राज्य की ओर लौटने लगे।

कुछ ही घण्टो में विजयपुर के सैनिको का एक अन्य समूह मैदानी भाग में पहुँच गया। यहाँ रामपुर के लोगो ने एक बहुत चौड़ा और लंबा गड्ढा लोगो ने खोद दिया था और उसके ऊपर घास ऐसी बिछाई थी कि किसी को कुछ पता ही नही लगे, वह हिस्सा बिल्कुल मैदानी भाग की तरह प्रतीत हो रहा था और वहीँ पास में  रामपुर के सैनिक छुपे हुए थे। जैसे ही विजयनगर के सैनिक वहाँ आये ,सब घोड़े सहित गड्ढे में गिर गए और फँस गए।तत्पश्चात छुपे हुए रामनगर के सैनिको ने उन्हें गड्ढे में ही मार डाला और हथियार और घोड़े गड्ढे से निकाल अपने राज्य की तरफ चल पड़े। अबतक इस तरह से विजयनगर के लगभग तीस हज़ार सैनिक खत्म हो चुके थे।

कुछ ही देर में एक और विजयनगर का सैनिक का समूह आया उन्होंने गड्ढे में मरे अपने साथियो को देखा। उन्हें बहुत दुःख हुआ और वो और क्रोधित हो गए। तत्पश्चात उन्होंने कुछ छोटे छोटे पुल बनाये और आगे बढ़ गए। कुछ दुरी पर ही रामपुर का तीसरा समूह इंतज़ार कर रहा था। यहाँ रामपुर के लोगों ने कुछ मोटी मोटी रस्सियाँ छुपा रखी थी और छुपकर इसके सिरे मजबूती से पकड़ रखे थे। जैसे ही यहाँ विजयनगर के सैनिक आये लोगो ने उनके घोड़ो को रस्स्सियो में फँसा कर गिरा दिया और फिर रामपुर के सैनिको ने हमला कर दिया।

यहाँ पर भी विजयनगर के कुछ सैनिक मर गए परन्तु कुछ ने तुरंत संभाल के युद्ध किया। यहाँ पर भी विजयनगर के सारे सैनिक मारे गए। परन्तु यहाँ कुछ सैनिक रामपुर के भी मौत के घाट उतर गए। बचे हुए रामपुर के सैनिकों ने हथियार लुटे और रामपुर राज्य में वापिस गए। तत्पश्चात तीनो समूह के सैनिक व अन्य लोग पहाड़ो पर चढ़ गए और इंतजार करने लगे विजयपुर की सेना का। कुछ ही समय में यहाँ विजयनगर के सैनिको के दो समूह आ गए। वे बहुत  गुस्से में थे क्योंकि उनके काफी सारे साथी पहले ही मौत के घाट उतर चुके थे। रामपुर में विजयनगर के सैनिक जैसे ही पहुँचे रामपुर के सैनिको व अन्य लोगों ने पहाड़ो से बड़े बड़े पत्थर गिराने शुरू कर दिए। इससे विजयनगर के कुछ सौनिक वीरगति को प्राप्त हो गए परन्तु बाकी के सैनिको ने बड़ी हिम्मत से रामपुर के सैनिको का सामना किया और अपने अस्त्र शस्त्र से काफी सैनिको को खत्म कर दिया। काफी देर तक युद्ध के बाद विजयनगर के सारे सैनिक खत्म हो गए और इसबार रामपुर के भी कुछ ही सैनिक ही बचे थे। वो सौनिक अब अपने राज्य की सीमा के पास पहुँचे। वहाँ  राजा वीरसिंह पूरी सेना के साथ सुसज़्ज़ित थे। इस वक़्त तक रामपुर की सेना में केवल आठ हज़ार सैनिक बचे थे जबकि विजयनगर की सेना में बीस हज़ार सैनिक बचे थे।

अभी भी विजयनगर की सेना दोगुने से अधिक थी जिसका मुकाबला कठिन था। कुछ ही देर में राजा इंद्रजीत स्वम् अपने सेनापति व मंत्रियो एवं सैनिको के साथ युद्ध के लिए पहुँचे। अब महासंग्राम की बरी थी। युद्ध शुरू हो गया दोनों सेना अपनी पूरी सेना के साथ युद्ध करने लगे। कुछी समय में विजयनगर का पलड़ा भारी होने लगा था। इस समय रामपुर के कुछ लोगो ने जो युद्ध के स्थान पर थे, गाँव में जाकर घोषणा करवा दी कि राजा की जान खतरे में है। तत्पश्चात बच्चे,स्त्री से लेकर बड़े बड़े लोग युद्ध की तरफ भागने लगे जिसे जो औज़ार मिला वही लेकर चल पड़ा। कुछ ही समय में वो सब युद्ध क्षेत्र में पहुच गए और सैनिको से लड़ने की पूरी कोशिश की,  यह कोशिश रंग लायी अब रामपुर का पलड़ा मजबूत हो गया। राजा इंद्रजीत ने जब देखा रामपुर में युद्ध लड़ने वाले लोगो की संख्या बहुत अधिक है तब उन्होंने युद्ध विराम की घोषणा कर दी और हार स्वीकार कर ली। राजा वीरसिंह ने भी पूरा साथ दिया और युद्ध विराम करवा दिया।

तत्पश्चात राजा इंद्रजीत, वीरसिंह के समक्ष आये और उनसे माफ़ी मांगी। वीरसिंह ने भी उन्हें माफ़ कर दिया। तब इंद्रजीत ने प्रश्न किया कि आपकी सेना इतनी कम थी फिर भी आपने हमारी इतनी बड़ी सेना को लगभग समाप्त कर दिया और आपके लिए पूरी जनता युद्ध में उतर गयी, ऐसा क्यों हुआ। राजा वीरसिंह में उत्तर दिया कि आपकी सेना आपसे डरती है और जबकि मेरी सेना मुझसे और अपने राज्य से प्रेम करती है। इसीलिए ये अपनी शक्ति से अधिक कार्य कर पाये। लोगो का देशप्रेम ही उन्हें यहाँ तक लाया।

ये सब बाते सुनकर राजा इंद्रजीत को अपना उत्तर मिल चुका था। फिर भी उनके मन में एक प्रश्न था जो उन्होंने एक आम आदमी से पूछा कि आपको अपने राजा इतने प्रिय क्यूँ लगते है? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया हमारे राजा ने कभी हमे अपने से अलग नही समझ सदैव हमारी समस्या को अपनी समस्या समझ कर हल किया सदैव जनता के हित में कार्य किया, इसके अलावा हमे और क्या चाहिये। वो हमारे लिए भगवान समान है। यह सुनकर राजा इंद्रजीत प्रभावित हुआ और अब उसे सब कुछ समझ आ गया।

तत्पश्चात उन्होंने राजा वीरसिंह से अपनी पुत्री राजकुमारी परी के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा और रिश्ता जोड़ने को कहा,इससे राजकुमारी रामपुर की रानी बन जाती और उनका वादा पूरा हो जाता।

राजा वीरसिंह ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और दोनों राज्य में संधि हो गयी। राजा इंद्रजीत ने साथ ही साथ अपनी मूर्त्यु के बाद अपना राज्य वीरसिंह को देने की बात कही। इस दिन के कुछ दिनों बाद राजा वीर सिंह का राजकुमारी परी के साथ हो गया और फिर से दोनों राज्य ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे।

 

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