जरुरी नही है कि जीत ही महत्वपूर्ण है, जिंदगी उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है और इसीलिए कार्य अपनी समझदारी से ही करना चाहिए।

 

गाँव में इन चारो दोस्तों को यारी को लगभग सभी लोग जानते थे। राम, जतिन , राजू और आर्यन बहुत अच्छे दोस्त थे, जैसे कि सभी बच्चों के दोस्त होते है, उनकी टोली होती है वैसे ही इनकी भी अपनी टोली थी। बचपन की बाते बड़ी ही निराली होती है ऐसे भी इनकी बाते भी खट्टी- मिट्ठी थी, यह सभी अपने बचपन को अच्छी तरह से जी रहे थे। इन सब में से जतिन सबसे बड़ा था और आर्यन सबसे छोटा, जतिन की उम्र तकरीबन पंद्रह वर्ष होगी, राजू की तेरह, राम की बारह और आर्यन की दस जो इन सबमे सबसे छोटा था। ये सभी एक ही विद्यालय की अलग-अलग कक्षा में पढ़ते थे। सभी बच्चों की तरह ये भी थे, दिनभर खेलना-कूदना, शरारत करना, मस्ती और एक-दूसरे का मज़ाक उड़ाना। इन सभी कार्यो के बिना इनकी दिनचर्या पूरी ही नही होती थी।

विद्यालय से छुट्टी होते ही विद्यालय से घर की ओर ऐसे दौड़ते जैसे मानो कितने वर्ष बाद जेल से छूटे हो। पीठ पर लटकता बस्ता खनकता रहता था और सब दौड़ते-दौड़ते घर पहुँच जाते थे। घर पहुँचते ही जैसे-तैसे खाना खाया और फिर तुरन्त खेलने के लिए निकल जाते। चारो दोस्त तब से लेकर अँधेरा होने तक खेलते रहते । खेल-खेल में इनकी भी सभी की तरह कभी-कभी आपस में लड़ाई हो जाती थी पर फिर कुछ ही देर में सब सुलझ जाता और फिर भाई-भाई बन जाते थे।

जतिन इन सबमे सबसे बड़ा तो था ही, साथ ही साथ हर खेल का विजेता भी वही था। खेल चाहे जैसा भी हो पर जीत हमेशा उसी की होती थी। किसी भी तरह के खेल में बाकी तीनो में से कोई भी उसे किसी भी तरह से चित नही कर पाता था। जतिन इन सबमे सबसे समझदार भी था और सबको एक साथ लेकर चलता था। हर खेल में उसका मुख्य प्रतिद्वंद्वी राजू ही रहता था, वह जतिन से केवल दो वर्ष ही छोटा था। राजू की हर बार एक ही तमन्ना रहती थी कि वह किसी भी तरह से  जतिन को हरा दे। हर बार राजू जीतने के लिए जी-जान लगा देता था पर हर बार वह हार जाता और जतिन हमेशा ही जीतता।

राजू को अपने हारने पर बहुत दुःख होता और फिर अगली बार जीतने का मन ही मन दृढ़ संकल्प लेता पर अब तक उसका यह संकल्प कभी भी पूरा नही हो पाया था। खेल चाहे जैसा हो पर जीत हमेशा जतिन की होती और हार हमेशा राजू की। राजू जीतने के लिए न जाने कितने हथकण्डे अपनाता था, वह अपना मनपसंद खेल चुनता, अपने आप ही अपने अनुकूल नियम बनाता पर फिर भी उसके हाथ हार ही लगती थी। इस कारण उसके मन में ईर्ष्या भी होने लगती पर फिर मन में अगली बार जीतने की उम्मीद जगती थी। खेलने-कूदने के अलावा इनकी तरह-तरह की शरारते भी दुसरो के चेहरे पर हंसी ला देती थी।

पेड़ो पर चढ़-चढ़ कर कूदना, आम,अमरुद, जामुन और बाकी के फल खाना इनके लिए रोज की बात थी। पेड़ो पर चढ़कर कूदते और शर्त लगाते कि कौन सबसे ज्यादा दूर कूदता है, पेड़ पर सबसे ऊपर कौन चढ़ पाता है, ऐसी-ऐसी  रोज इनकी न जाने कितनी छोटी- छोटी प्रतियोगिताएँ होती रहती थी, पर हर बार सबका विजेता एक ही होता था और वह था जतिन। ऐसे ही इनके दिन मजे में बीत रहे थे। सर्दियो का मौसम आ गया था, इन दिनों गाँव की दुकानों में नए-नए तरह-तरह के कंचे आये थे और इनके कंचे बच्चों का मन मोह रहे थे। विभिन्न रंगो के चमकदार कंचे, गोल-गोल सुंदर-सुंदर कंचे..। सभी की तरह इन बच्चों को कंचे बहुत भा रहे थे और सभी ने अब बाकी फालतू की चीज़े खाना छोड़कर कंचे खरीदने शुरू कर दिए। चारो दोस्त अपने सभी रुपयो के कंचे खरीदते और फिर इन कंचो से खेलना शुरू हो जाता। इन दिनों पूरे गाँव में बस कंचो का ही खेल प्रचलन में था। इन चारो की रोज आपस में प्रतियोगिता हो जाती और इसमें भी हर बार जतिन ही जीतता था। राजू रोज नए कंचे खरीदता और खेल कर हार में गँवा देता था बस उसके मन में एक उम्मीद की किरण रहती थी कि वह कभी तो जीतेगा और अपने सारे कंचे जीतकर वापिस ले लेगा। रोज इनका कंचो का खेल होता और जतिन ही जीतता।

जतिन ने कुछ ही दिनों के अंदर बहुत से कंचे जीत लिए थे और अब उसे कंचे खरीदने की जरूरत नही होती थी। ऐसे ही दिन बीतते गए और कंचो का खेल होता रहा। कुछ महीनो में कंचो का खेल पुराना हो गया और अब फ़रवरी का महीना आ गया था, कुछ ही दिनों में वार्षिक परीक्षा शुरू होने वाली थी और इसी कारण उनका कंचे का खेल छूट गया, अब सब पढ़ने में ध्यान देने लगे।  सभी का ध्यान अब सिर्फ और सिर्फ पढाई में था और अब उनका खेलना केवल न के बराबर ही था। समय बीत और उनकी वार्षिक परीक्षा शुरू हो गयी। सभी ने पूरी मेहनत से अपनी-अपनी परीक्षा दी।

कुछ ही दिनों में परिणाम की घोसणा हुई। इस बार जतिन ने नवी कक्षा की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। राजू ने भी सातवी कक्षा में तृतीय स्थान प्राप्त किया और बाकी दोनों ने अपनी-अपनी परीक्षा में द्वितीय स्थान प्राप्त किया। सभी अपने परिणाम से बहुत खुश थे। राजू भले ही तृतीय आया हो पर वह भी बहुत खुश चूँकि अब तक की जिंदगी में पहली बार राजू ने अपनी कक्षा में कोई पद प्राप्त किया था। जतिन भी अपने परिणाम से बहुत खुश था।

सभी के माता-पिता भी अपने बच्चों के परिणाम से बहुत खुश थे। जतिन को उसके पिता ने इस ख़ुशी में एक नई साईकिल दिला दी। साईकिल मिलने पर जतिन बहुत खुश हुआ। तुरन्त अपनी नई साईकिल पर सवार होकर बाकी दोस्तों के पास निकल गया। सभी दोस्तों को उसने बुलाकर अपनी नई साइकिल दिखाई और सभी उसकी साइकिल देखकर खुश हुए, फिर साईकिल की तारीफ करने लगे। सभी को जतिन की साईकिल बहुत भा रही थी। राजू को भी उसकी साईकिल बहुत पसंद आ रही थी और फिर उसने जतिन से एक बार सवारी करने के लिए साईकिल मांग ही ली। जतिन ने राजू को अपनी साईकिल दे तो दी पर एक बार ही चलाने के लिये। राजू तुरन्त साईकिल पर सवार हुआ और दौड़ाने लगा। पर कुछ ही देर में जतिन ने उससे अपनी साइकिल वापस ले ली।

राजू को अब भी साईकिल चलाने का मन कर रहा था। उसे वह साइकिल बहुत ज्यादा ही भा रही थी। अब जतिन बस अपनी साईकिल दौड़ाने में लगा हुआ था। उसकी साईकिल हवा से बाते कर रही थी। फिर सभी अपने-अपने घर को निकल गए। राजू को अब साईकिल लेने का बहुत मन कर रहा था, आखिर वो जतिन से पीछे कैसे रह सकता था। घर पहुँचते ही राजू भी अपने पिता से साईकिल के लिए जिद्द करने लगा। काफी देर तक बोलने के बाद राजू के पिता उसे साईकिल दिलाने के लिए तैयार हो गए और इसका कारण कही न कही यह भी था कि राजू की पढाई में सुधार हो गया था और इस बार वह अपनी कक्षा में तृतीय आया था। अगले दिन ही राजू अपने पिता के साथ बाजार गया और एक बढ़िया सी साईकिल खरीद ली। गाँव में साईकिल लाते ही वो भी जतिन की तरह सबको बुलाने निकल गया। आज उसने भी सबको इक्कठा किया और सबको अपनी साईकिल दिखाई। सबने उसकी साईकिल देखी और यह साईकिल भी बहुत सुंदर थी और आज जतिन ने भी उसकी साईकिल की तारीफ कर दी तो उसे बहुत ख़ुशी मिली।  अब दोनों अपने साईकिल पर सवार हुए और राजू ने अपने पीछे आर्यन को व जतिन ने अपने पीछे राम को बिठा लिया। फिर दोनों ने अपनी साईकिल को हवा में दौड़ाना शुरू कर दिया।

दोनों हवा से बात करते हुए साईकिल चला रहे थे। दोनों में आपस में प्रतिस्पर्धा हो रही थी कि कौन ज्यादा तेज़ साईकिल चलाएगा। दोनों अपनी पूरी कोशिश कर रहे थे पर जीत जतिन की हो रही थी।  साईकिल चलाते- चलाते अँधेरा हो गया और उनको समय का पता ही नही चला। अँधेरा होने पर सब घर की ओर निकल पड़े। अब रोज शाम को दोनों अपनी-अपनी साईकिल लेकर निकल जाते और फिर आर्यन और राम को भी अपनी साईकिल पर बैठा लेते थे और फिर साईकिल दौड़ाने लग जाते थे।

अब रोज शाम को उनका केवल एक ही खेल था और वह था साईकिल दौड़ाना। सभी को इसमें बहुत मज़ा आ रहा था। रोज उनकी साईकिल की आपस में प्रतिस्पर्धा जरूर होती थी और परिणाम हर बार की तरह ही होता था। पर राजू के मन में एक उम्मीद की किरण थी कि उसका भी समय आएगा और वह जतिन से जरूर जीतेगा। इसी कारण से उसने जतिन से साईकिल की दौड़ में जीतने की शर्त लगा ली और इसके लिए समय एक महीने बाद तय किया गया। जतिन ने भी इस शर्त के लिए हामी भर दी। इसके बाद से भी रोज आपस चारो खेलते अपनी साईकिल दौड़ाते पर अब राजू अपनी लगाई हुई शर्त  के लिए मेहनत कर रहा था और अब वह सुबह-सुबह भी अपनी साईकिल चलाता। दोनों अंतिम प्रतिस्पर्धा के लिए नियमित रूप से अभ्यास कर रहे थे। पर इससे उनके शाम की दिनचर्या पर कोई प्रभाव नही पड़ रहा था। धीरे-धीरे यूँ ही दिन बीतते गए और अब प्रतिस्पर्धा का दिन आ गया। राजू और जतिन दोनों शुरुआत की लकीर पर अपने साईकिल पर सवार हो कर खड़े हो गए और फिर राम ने आवाज़ लगाकर उनकी प्रतिस्पर्धा शुरू करवा दी। इस दौड़ के अंतिम स्थान पर आर्यन खड़ा था और उनका इंतज़ार कर रहा था। राजू और जतिन दोनों अपनी साईकिल हवा में दौड़ा रहे थे और राजू के दिमाग में केवल एक ही लक्ष्य था और वह था दौड़ में जीतना। इसीलिए राजू शुरी से ही अपनी साईकिल पूरी ताकत से दौड़ाने लगा और इसी वजह से वह जतिन से काफी आगे निकल गया। आज मन ही मन राजू बहुत खुश हो रहा था , उसे लग रहा था शायद आज पहली बार जतिन से जीतेगा।

वही जतिन संयम से अपनी साईकिल दौड़ा रहा था। दोनों की कोशिश प्रतिस्पर्धा को जीतने की थी। धीरे-धीरे  राजू की चाल धीमी होने लगी क्योकि वह अब थक रहा था पर दौड़ खत्म होने के लिए कुछ दुरी बाकी थी। वही जतिन ने अब अपनी चाल बढ़ा दी थी और अब वह अपनी पूरी शक्ति से साईकिल चला रहा था। कुछ ही देर में जतिन ने राजू की बराबरी कर ली थी और यहाँ से अब कुछ कदमो की दुरी थी। पर राजू की चाल धीमी थी क्योंकि वो अबतक बुरी तरह से थक चूका था जबकि जतिन की चाल अब बहुत तेज़ थी।

आज फिर जतिन प्रतिस्पर्धा जीत गया और राजू प्रतिस्पर्धा हार गया। आज राजू को बहुत दुःख हो रहा था क्योंकि उसे लग रहा था कि वह अपना जीता हुई दौड़ हार गया। आज फिर जतिन का तजुरबा राजू पर हावी हो गया था। फिर राजू दुःखी मन से घर की ओर निकल पड़ा। जतिन ने भी आर्यन को अपनी साईकिल पर बैठाया और फिर वो भी घर की ओर निकल गया। घर पहुँचते-पहुँचते अँधेरा हो चुका था। अगले दिन से उन दोस्तों के बीच सब कुछ सामान्य हो चुका था। पर अब भी राजू के मन की तमन्ना पूरी नही हुई थी। यूँ ही दिन बीतते गए और अब उनके लिए साईकिल शौक पूरा करने का जरिया नही केवल जरूरत पूरा करने का साधन थी। अब उनकी पुरानी मस्तियाँ शुरू हो चुकी थी। अब उनकी गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी थी और अब तो उनकी मस्तियाँ बढ़ गयी थी। पेड़ो पर आम आ गए थे और अब पेड़ो से आम तोड़ कर खाना इनकी दिनचर्या में था। राजू के पिता के कुछ आम के बाग थे और राजू उन बागो के आम तोड़ने के लिए नियमित रूप से जाया करता था। एक दिन राजू को एक युक्ति सूझी जिससे वह जतिन को हराया जा सकता था। उसने आम तोड़ने की प्रतियोगिता रखी कि कौन ज्यादा आम पेड़ से तोड़ सकता है, क्योंकि राजू ने बहुत आम तोड़े थे इसीलिए उसे लगा कि जतिन उससे ज्यादा आम नही तोड़ पायेगा।

जतिन,राम और आर्यन सभी ने भी प्रतियोगिता के लिए हामी भर दी। अगले दिन तड़के ही चारो घर से निकल गए। चारो साईकिल से जल्दी ही राजू के आम के बाग़ पर पहुँच गए। वहाँ सभी ने एक आम का बड़ा सा पेड़ प्रतियोगिता के लिए तय कर लिया। सभी जल्दी से पेड़ पर चढ़ गए पर आर्यन नही चढ़ा। वह जनता था कि वह जीत नही सकता और उसे पेड़ से आम तोड़ना भी ढंग से नही आता और इसीलिए वो जमीन पर गिरे हुए आम अपने थैले में भरने लगा। बाकी तीनो अपने-अपने थैले लेकर पेड़ चढ़ गए थे। तीनो अपनी पूरी मेहनत के साथ आम तोड़ रहे थे पर जतिन बड़ी ही फुर्ती से आम तोड़ने में लगा था। राजू भी बड़ी तेज़ी से आम तोड़कर अपना थैला भर रहा था। कुछ ही देर में नीचे के सारे आम खत्म हो गए और फिर वो तीनो थोड़ा ऊपर चढ़ कर आम तोड़ने लगे। तीनो तेज़ी से अपने थैले भरने में लगे थे और कुछ ही देर में वहाँ भी आम खत्म ही गए। राम के बस में अब और ऊपर चढ़ना न था और इसीलिए वह नीचे उतर गया। अभी भी राजू और जतिन थोड़ी और ऊपर जा कर आम तोड़ रहे थे और फिर वहाँ के आम खत्म होने के बाद जतिन भी अपना थैला लेकर नीचे उतर गया। जतिन ने समझदारी से काम लिया क्योंकि वह समझता था कि प्रतियोगिता ही सबकुछ नही है, यदि वो और ऊपर जाता तो गिरने का खतरा होता और इतनी ऊँचाई से गिरने का मतलब था अपने हाथ-पैर तुड़वाना। पर राजू को तो जीतने की पड़ी थी और वह और ऊपर पतली-पतली टहनियों पर चढ़ गया और अपना थैला पेड़ में लटका दिया, फिर वो आम तोड़ने में मग्न हो गया, अभी उसने कुछ ही आम तोड़े थे कि जिसका डर था वही हुआ और राजू का पैर टहनी पर से फिसला और वह नीचे गिरा। जतिन ने उसे बचाने की कोशिश की पर जबतक वो वहाँ पहुँचता राजू गिर कर बेहोश हो चुका था। जतिन ने बिना देरी किया उसपर पानी के छींटे, उसे होश तो आ गया पर उसके सर से बहुत खून निकल रहा था। जतिन ने रुमाल से सर बांधा और उसे अपनी साईकिल के पीछे बैठाया और जल्दी से  निकल गया। राम भी साईकिल से सवार होकर उसके पीछे-पीछे गया और आर्यन वही आम की रखवाली करने लगा। जतिन उसे उसके घर ले गया और राम जल्दी से डॉक्टर को राजू के घर पर बुला लाया। डॉक्टर ने उसका उपचार किया, राजू के सर में चोट व पाँव में मोच आई थी। डॉक्टर के जाने के बाद जतिन उसके सामने खड़ा था।

उसकी आँखों से राजू को ऐसा लग रहा था मानो वह उसे कह रहा हो,” मै तुमसे दो वर्ष बड़ा हूँ और तजुरबे में भी तुमसे आगे अधिक हूँ।” तभी राजू के पिताजी भी वहाँ आये। उन्होंने राजू से बात की और फिर चले गए। राजू की माँ राम और जतिन के लिए नास्ता ले कर आ गयी। उनके जाने के बाद जतिन ने कहा,” राजू तुम आज मेरे से प्रतियोगिता में जीत गए हो।” पर राजू कहने लगा,”आज भले ही मै जीत गया हूँ पर तुम ही असली विजेता हो।” चूँकि आर्यन वहाँ इन सबका इंतज़ार कर रहा था इसीलिए राजू बहाना बनाकर उन दोनों के साथ निकल गया। कुछ ही देर में वो बगीचे पर पहुँच गए थे वहाँ आर्यन उनका इंतज़ार कर रहा था। वहाँ चारो थैले उन्होंने लिए और आर्यन को भी साईकिल पर बैठाया और घर की ओर निकल पड़े। राजू को घर पर छोड़ कर बाकी सब अपने घर निकल गए।

सारे आम उन्होंने राजू के घर पर दे दिया। राजू ने सोचा क्यों न सबके आमो को गिन लिए जाये, जो होना था वो तो हो गया। आर्यन के थैले में केवल बत्तीस आम थे, राम के थैले में एक सौ तीन आम थे। जब उसने जतिन के थैले के आम गिने तो उसमे एक सौ बासठ आम थे जबकि उसके खुद के थैले में सिर्फ एक सौ इकसठ आम थे, मतलब आज भी राजू ने एक आम कम तोड़ा था। राजू ने मन ही मन सोच लिया कि जतिन सिर्फ उसकी ख़ुशी के लिए उसे जीता रहा था। मन ही मन उसे ऐसा दोस्त मिलने की बहुत ख़ुशी थी और अब वह सबकुछ समझ चुका था। अब राजू के मन में जतिन को हराने का भूत उतर चूका था। अगले दिन फिर से जतिन उसे बुलाने के लिए आया  और उसे देखकर आज राजू मुस्कुरा दिया और उसके साथ चल पड़ा।

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