“…मम्मा, मम्मा !…ऊँहूँ हुँ ऊँहूँ!” निक्की आकर माँ के गले लग रोने लगी|

“क्या बात हैं, बिटिया, क्यों रोए जा रही है।” माँ ने सशंकित होकर पूछा|

निक्की बिलखते हुए बोली, “मम्मा, आज फिर उस लफंगे ने मुझको छेड़ा।”

“कौन ? कहाँ ..? मुझसे क्यों न कहा ? चुप हो जा और चल मेरे साथ। अभी बताता हूँ उस हरामखोर को !” बहन के मुंह से सुनते ही भाई रोहित क्रोध में बोल पड़ा।

“सुन रोहित…, अरे सुन तो …., रुक जा बेटा। मारपीट से कुछ हासिल होगा क्या ?”

“तो क्या करूँ, मम्मी, तुम्हीं बताओ। वो बदमाश रोज-रोज छेड़ रहा है निक्की को..! एक बार चार दोस्त मिल के पीट आते हैं उसको तो नजर न उठाएगा दोबारा।”

“आदर्श, तू क्या चुपचाप बैठा है, चल मेरे साथ तू भी। तुझे क्रोध नहीं आ रहा यह सब सुनकर ?

“भैया, क्रोध से आग भड़केगी, शांत तो न होगी न ! तुम आज चार लोग मिलकर उसे पिटोगे, कल वो आठ मिलकर हम दोनों को पीटेंगे। ऊपर से दीदी को भी चैन से न जीने देंगे।”

“चलो न, पुलिस में रिपोर्ट करा आते हैं।”

“नहीं, नहीं, इससे बदनामी होगी। लोग निक्की को ही बुरा-भला कहेंगे। फिर आगे चलकर इसकी शादी में दिक्कत आयेगी। शांत बैठो दोनों भाई ! कल पापा आयेंगे, फिर देखते हैं वे क्या कहते हैं इस मामले में।”

दूसरे दिन खाना-पीना शांति से निपट गया। कोई एक शब्द भी न बोला | सभी को चुप देख कर आशीष ही बोल पड़े, “अरे तुम सब बहुत शांत बैठे हो आज ? क्या बात हैं ? कोई अनहोनी हो गयी क्या ? क्यों रोहित, फिर कहीं से लड़के तो नहीं आया ?”

रोहित के अंदर सुलगती आग जैसे भड़क उठी, “नहीं पापा, लड़ के तो नहीं आया, परन्तु लड़ना चाहता था। मन मसोस कर रह गया हूँ बस। मम्मी और इस आदर्श ने कुछ करने न दिया।”

थोड़ा रुककर रोहित बोला, “अब आप आ गये हैं, आप ही बताइए, कोई समाधान निकालिए। निक्की को रोज एक लड़का परेशान कर रहा है ! हमें क्या करना चाहिए ? आप कहिये तो कल ही दस-पांच लात घूसे मारकर उसे ठीक कर दूँ।”

“निक्की, निक्कीsss ..!” चीखे आशीष।”बुलाओ उसे |” क्रोध से पत्नी की ओर देखते हुए आशीष बोले।

निक्की डरती हुई सामने खड़ी हो गयी। भय से वह काँप रही थी।

“कौन है वो लड़का , क्या तुम्हारा दोस्त है?”

“जी,जी पापा..पर मेरा …. “

“ऐसे दोस्त बनाती फिरती है तू ! तुझे पढने भेजते कॉलेज या ऐसे दोस्त-यार बनाने !”

“अरे सुनो तो जी ..!”

“तुम चुप रहो , सब तुम्हारे ही लाड़-प्यार का नतीजा हैं | एक अवारा बन घूम रहा है। २८ वर्ष का हो गया, पर अभी तक इसके कैरियर का कोई अता पता नहीं है। और एक ये छोटे मियां है, हर तीसरे साल फेल होते रहते है। और ये है कि लफंगे दोस्त बना रही हैं।”

पत्नी को घूरते हुए आशीष फिर शुरू हो गए, “तुम घर में बैठे-बैठे न जाने क्या करती रहती हो ! इन सब को सम्भाल भी नहीं पायी। सही परवरिश देती तो ये ऐसे कतई न होतें जैसे हैं ! सुमेर सिंह के बेटे को देखो, वह ‘आइएएस’ हो गया। बिटिया उनकी भी इसी के काँलेज से तो पढ़कर निकली है ! उसे तो किसी ने कभी न छेड़ा ! आज वह भी सुमेर के ढूढ़े हुए लड़के से शादी कर के खुशहाल जीवन जी रही है।”

“आप सुनते तो हैं नहीं ! बस सुनाने लगते हैं ! इसी लिए सारे बच्चे नालायक निकले है। आज अपनी नौकरी की तरह इन्हें भी अगर प्यार-दुलार दिए होते, तो ये दिन न देखने पड़ते हमें।” गुस्से और अपमान से तमतमाई सुषमा बोली।

रोहित जो शांत था, सुनकर अचानक भड़क उठा, “आप दोनों आपस में ही लड़ लीजिये ! मैं नौकरी नहीं पा रहा हूँ क्योंकि आपने मुझे सही लाइन को पकड़ने के लिए गाइड नहीं किया। जिस पथ पर चलने की योग्यता मुझमें थी, वह पथ मुझे किसी ने दिखाया ही नहीं। माँ ने अनपढ़ होने का बहाना बना लिया और आपने अपनी नौकरी का। इस नौकरी से हमें क्या मिला, आप देख ही रहे हैं। अब तो इज्जत भी जाने को है। आज ही निक्की ने डरते डरते कहा मुझसे कि वह नालायक इसे उठाने की धमकी दे कर गया है।”

“है कौन वह लड़का! क्या नाम है उसका ?” आशीष थोड़ा नार्मल होते हुए बोले।

“वो इस आदर्श का दोस्त है।” रोहित ने आदर्श की तरफ इशारा कर के कहा।

“चटाक !…” थप्पड़ की आवाज़ कमरे में गूँज उठी। आर्दश गाल सहलाता रह गया । कड़क कर पिता ने कोसा उसे, “ऐसे नालायक दोस्त हैं, तभी फेल हो रहा है। सुधर जा और अपनी संगत सुधार ले तू ! संगत का असर बहुत पड़ता हैं। तू चन्दन का पेड़ नहीं है जो सांप तुझे घेरे रहें और तू विषहीन बना रहेगा।”

माँ अब तक देख रही थी सब, सहमी हुई सी। अपनी पूरी ताकत से हिम्मत को समेटती हुई आगे बढ़ी और ‘१०९८’ नम्बर डायल कर दिया। उधर से ‘हैल्लो’ बोला गया तो बोली, “हेल्लो सर, मेरी बेटी निक्की को उसके स्कूल छूटने के बाद रास्ते में कुछ बदमाश लड़के छेड़ते हैं अक्सर। आज दस दिन हो गये तकरीबन। बहुत ज्यादा परेशान कर रहे है। आप कुछ कीजिए कृपया । इन बढ़ती घटनाओं में कहीं यह भी एक घटना न होकर रह जाए | आखिर ये आपके ही विभाग की नाक का सवाल है।”

फोन काटते ही आशीष आग बबूला हो गया सुषमा पर, “यह क्या किया तूने ? ये खबर उड़ते ही पत्रकार कीचड़ उछालने लगेंगे मुझ पर और पूरे डिपार्टमेंट पर।”

“तो क्या करती? उस उछलने वाले कीचड़ के डर से चुप रह जाती। आखिर मेरी बेटी का सवाल है ! कीचड़ में मैं और मेरी बेटी की गर्दन पूरी तरह डूब जाय इससे अच्छा है उसके पहले ही मैं आव़ाज उठाऊं। कीचड़ के छीटें मंजूर है, पर कीचड़ में डूबना बिलकुल भी मंजूर नहीं मुझे।”

“तुम जानती नहीं क्या कि वर्दी पर कीचड़ उछालने के ही फ़िराक में रहते ये पत्रकार लोग ? यही जज, वकील सब कल को बिटिया पर तरह-तरह के सवाल दागेगें! तो क्या सुन पाओगी तुम ? सह पाओगी, बताओ तो जरा ?”

“सब सुन लूंगी और सह लूंगी जी ! बेटी पर आंच आये तो माँ क्या नहीं सह-कह सकती है ! क्या इनके घर बेटियां नहीं होती है ?”

सुषमा कमर पर साड़ी का पल्लू बांधते हुए बोली, “अब आप अपनी नौकरी करो ! मैं देख लूंगी ! हिम्मत हो तो, वो लफंगें दिखाए छेड़ के अब !”

“तो अब तक क्यों चुप थी? क्यों नहीं बोली ?”

“अब तक तुम्हारे भरोसे थी ! मेरे आगे आने पर, कोई आप पर ऊँगली न उठाए, इस बात का ध्यान रख रही थी ! पर आपने तो मेरी ममता, मेरे अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया। कल ही बताती हूँ ! अब आप देखिये मेरे स्त्रीत्व की ताकत।”

दूसरे दिन सुबह सबेरे ही नारों से पूरा मुहल्ला गूंज रहा था । महिलाओं की भारी तादाद जमा हो गयी थी | आगे-आगे सुषमा नारा लगाती हुई बढ़ रही थी।

“अब ना सहेंगे नारी का हम अपमान

हमें भी चाहिये अब अपना सम्मान |”

उस लड़के के घर के सामने जाकर भीड़ थम गयी | उसकी माँ ने दरवाज़ा खोला तो सुषमा शेरनी की तरह दहाड़ उठी। सुषमा की दहाड़ को सुनकर वह गीदड़ यानि निहाल अंदर ही दुबका रहा।

माँ को उसके बेटे की करतूत बताते हुए सुषमा क्रोध से कांपी जा रही थी। स्थिति की नजाकत देखते हुए निहाल की माँ ने सुषमा से माफ़ी मांगी। और कहा, “आइन्दा से मेरा बेटा निहाल आपकी बेटी ही नहीं बल्कि किसी भी लड़की को नहीं छेड़ेगा। इसकी गांरटी मैं लेती हूँ। यदि ऐसा हुआ तो मैं खुद ही इसे पुलिस के हवाले कर दूँगी |”

हाथ जोड़ते हुए भीड़ के सामने उसने सभी से माफ़ी मांगी|

पुलिस भी आ गयी। दरोगा जी ने भी निहाल और उसकी माँ को धमकाते हुए वार्निंग देकर छोड़ दिया। फिर उसने सुषमा से उनकी हिम्मत की तारीफ करते हुए कहा, “आप जैसी महिलाएं आगे बढ़े तो ऐसी घटनाएं उजागर हों और ऐसे बदमाशों का मनोबल बढ़ने ही न पाए।”

उसके अगले दिन ही पेपर की सुर्खियों में थी सुषमा। हर तरफ़ उसकी वाह-वाह हो रही थी। अख़बार की हेडलाइन्स थीं–

“अदम्य साहस दिखाते हए एक महिला ने अपनी बेटी की एक सिरफिरे से की रक्षा।”

पेपर पढ़ रोहित गदगद हो गया। अगले ही पल एक दूसरे अखबार की खबर आई–“एक पुलिस वाला ही अपनी बेटी की रक्षा नहीं कर सका शोहदों से।”

खबर पढ़कर रोहित को क्रोध आया, परन्तु अब वह संयमित रहना सीख रहा था। क्रोध पर काबू करके अख़बार को शांति से मेज पर रख वह अपनी माँ के पास चल दिया।

माँ के गले लग रोहित बोला, “माँ आपका स्वाभिमान यूँ ही बना रहेगा। और कल ही मैं निक्की का नाम कराटे की क्लासेज़ में लिखवा दूंगा ताकि यह आत्मरक्षा के गुर सीख सके।”

तीनों बच्चे बारी-बारी से गर्वपूर्वक अपनी माँ के गले लग अपने-अपने कमरे में किताब लेकर पढ़ने बैठ गये। इस प्रण के साथ कि अब अपना और अपने माँ बाप का सर नीचा न होने देंगे कभी, और न अपनी माँ को पिता के सामने कमजोर साबित करेंगे।

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