क्या होता अगर हम सोचना ही छोड़ देते ? चलिए पता लगाते हैं !

 

आज यूँ ही कलम थाम इस सोच में मैं डूबा की यूँ तो पता नहीं कितने ही पन्नों को मेरी स्याही ने  मेरी सोच से भरे होंगे आज उसी सोच पे लिखने बैठा, तो पता नहीं कहाँ मेरे मन के भाव शब्दों के अभाव में कहीं दफ्न से हो गए,पर सहसा मन में ये ख्याल आया कि क्या होता अगर हम सोचना ही छोड़ देते!

तो शायद, माँ बाप अपने बच्चों को जल्दी सफल देखने के लिए उनके मासूम बचपन का क़त्ल ही नहीं करते! शायद दूसरो से बड़े बनने की चाह में एक दुसरे को मारने की नौबत ही न आती, शायद उस ईश्वर ने अगर इस सृष्टि के रचना के बारे में ही न सोचा होता तो आज हमारा वजूद ही नहीं होता शायद, अगर मैंने न सोचा होता तो ये मन के भाव कभी लफ़्ज़ों में बयां ही न हो पाते! पर कलम अब भी हाथों में ही है, स्याही कागज के पन्नों को भरने के लिए बेकरार है पर सवाल अब भी यही है की लिखूं तो लिखूं क्या ?

 

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