एक कड़ी है बीते हुए बचपन और आने वाले बचपन के बीच कई बार हालात ऐसे होते हैं जब चाहते हुए भी इंसान अपनी ख्वाइशों का गला घोंटने के लिए मजबूर हो जाता है, और फिर जब उसके जीवन में एक नयी ज़िन्दगी अंकुरित होती है तो वही इंसान प्रयास करता है अपने मासूम के एक बेहद खूबसूरत बचपन के सपने को संजोने का

 

नन्ही सी जान के पाँव अभी पालने में पड़े ही थे कि दादाजी का फरमान आया ‘आर्मी अफसर’ बनेगा मेरा पोता, कुछ समय बीता जब अपने पैरों के बल चलना शुरू किया तो एक दिन चाचाजी पुचकारते हुए बोले डॉक्टर बनेगा मेरा भतीजा। कुछ समय और गुजरा अब कंधो पर किताबों से भरे बास्ते का बोझ था पिताजी का आदेश आया ‘इंजीनियर’ बनेगा मेरा बेटा। बेचारा चूहों की अंधी दौड़ से निकलकर , कॉलेज पहुचा ही था कि माँ का सन्देश पहुंचा ‘आई.ए. एस’ बनेगा मेरा लाल।

सारे सगे-सम्बन्धियों के सपनो को, सबकी आरजू को एक साथ समेट अपने कंधों पर लिए घूमता था, इस कश्मकश में की किसकी आरजू पूरी करूँ? ‘आई.ए. एस’ अफसर का सोचता तो लगता चाचाजी बुरा मान जायेंगे, ‘इंजीनियर’ का सोचता तो दादाजी के रूठ जाने का डर।

इसी उलझन में कई दीन बीते, फिर महीने गुजरे और फिर साल।दूसरों के सपनों का बोझ अपने कंधों पर लिए घूमते-घूमते कब अपनी ख्वाईश का दम घुट गया पता ही नहीं चला।आख़िरकार सब कुछ हार कर एक शाम, एक छोटे से सरकारी दफ्तर के कोने में पड़ी एक कुर्सी पर बैठा समय काट रहा था, की तभी टेलीफोन की घंटी बजी,उठाया तो पता चला वो बाप बन गया है।भाग कर अस्पताल पहुँचा, वही इंसान जिसके नन्हें से पाँव कभी पालने में पड़े थे, आज अपने ही पूत को पालने में निहार रहा था ।

“ जीवन के कई सत्य में से एक कटु सत्य यह भी है कि हर इंसान दुबारा अपने वारिस के भेष में खुद को फिर से जीवन के इस घूमते पहिए में यथार्थ पाता है। मानो ऐसा प्रतीत होता है की अपने बच्चे को बड़ा होते देख हर बाप की यही ख्वाइश हो की जो चीज़ें उसके बचपन में अधूरी रह गयी वो कुछ भी करके अपने बच्चे को उनसे महरूम न रखे। अपने बीते हुए कल को जब कोई पिता अपनी आँखों के सामने चलते,भागते और दौड़ते हुए सोचे तो उस स्थिति में भावनाओं पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाता है।”

इसी कारण अचानक उस पिता के मन में दबे भाव उमड़ पड़े और अनायास ही उसके मुँह से निकला-

जा जी भर के जी ले अपना बचपन,ये दुनिया बड़ी जालिम है, पहले तो कंधो पर इतना बोझ दाल देगी की संभाले न सम्भले और बाद में यही दुनिया यह कह कर धिक्कारेगी की एक सपना पूरा नहीं कर सका, कंधो में जान ही नहीं थी।

अब सच ही तो कहते हैं लोग की कंधो में जान ही नहीं है।भला जिस उम्र में बच्चा अपनी तोतली जुबान से चंद अलफ़ाज़ बोल पाता हो, वो क्या समझे ‘इंजीनियर’ और ‘डॉक्टर’ का मतलब।

मेरे लाल जी भर के जी ले अपनी ज़िन्दगी, पूरी कर ले अपनी तमन्ना, अपनी ख्वाइशें और अगर जीवन में कुछ बनना ही हैं तो सर्वप्रथम एक अच्छा इंसान बनना। क्योंकि इस दुनिया में इंजीनियर,डॉक्टर या आईं. ए. एस ऑफिसर की तो कोई कमी नहीं है , पता नहीं फिर भी क्यों अब भी इस दुनिया में ‘अच्छे इंसान’ और ‘इंसानियत’ ढूंढ़े नहीं मिलती।

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