Author: Rishi Raj

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  मेरे फ़ोन की उस हिंदी ‘keyboard’ के ‘Backspace’ बटन की, अपनी एक अनोखी कहानी है, ख्यालों को शब्दों में ढालने से ज्यादा, उसने आवारा अक्षरों को ख़याल बनने से रोका है।।  

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  ‘लालटेन’ सी रोशनी में भी’वो’ सरहद पे पहरेदारी करता है, बस इस ख्याल में की, कहीं किसी आँगन में रोशनी,हँसी, ख़ुशी और सुकून आपस में गप्पे लड़ाती होंगी।।

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  कभी 5 इंच की स्क्रीन पर उंगलियों को कसरत कराने से फुर्सत मिले तो आखों से पैगाम भेज कर देखना, लाजवाब होते हैं वो पैगाम जिनके जवाब इशारों में आते हैं|

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  तकदीर की उंगली थाम, निकल पड़ते हैं मेहनत की राह पर गरीबों के बच्चे, इनके नसीब में ‘शार्टकट’ का सुकून नहीं होता!

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  छत पे बँधी उन रस्सियों ने भी बहुत कुछ संभाल रखा है, हर दिन ‘बंद घर’ से निकलती, उस ‘खुली आबरू’ का पूरा ख्याल रखा है।।

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  जहाँ एक ओर रंग-बिरंगे कागज़ के टुकड़ो के पीछे भागती इस अंधी भीड़ को देखकर, सब कुछ इतना उलझा-उलझा सा लगता है। वहीँ पेचेदगियों से भरे उस ऊन को गोले को, ‘माँ’ के हाथों में करतब खाता हुआ देखकर, सब कुछ जैसे कितना सुलझा-सुलझा सा लगता है।।

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Jan 6

बल्ब

गाओं के चौराहे पर एक ‘बल्ब’ लटका हैं, कोई दो साल चला होगा शायद, सुना हैं खुद को बुझाकर कई ‘तक़दीरें’ रौशन करी हैं उसने

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  एक पुराना घर है , कोने में एक पुरानी कुर्सी पड़ी है, सुना है जब नयी थी, तब उसके आस-पास खूब चहल-पहल हुआ करती थी, अब तन्हा सी पड़ी हैं । उसी घर में एक पुराना बुढा आदमी रहता है, सुना है जब नया हुआ करता था तब !