Author: Rishi Raj

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हाँ इस ओर तिरंगा था और उस ओर चाँद-सितारा। जोश भी वही था, सम्मान भीवही। एक सी ही तो थी हवाओं में वो माटी की खुशबू।एक से ही लोग थे, एक सा ही भेष।एकसी ही बोल थी और एक सा ही देश। एक शाम दोस्तों के संग मैं निकला था घूमने। अपने देश की शान को आँखों से…

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माना कि लाइफ फ़ास्ट हो गयी है,हमारी जरूरतें भी काफी भास्ट हो गयी हैं, इनसब को पूरा करने के लिए ‘सक्सेसफुल’ तो बन गए हैं हम, पर इस बीच कहीं इंसानियतलॉस्ट हो गयी हैं।     मुँह पर लगाकर ख़ामोशी का ताला, आँखों पर बांधकर पट्टी। कानो को हाथों से ढककर, हम बढ़ जाते हैं…

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  हथेली पे खाये उन डस्टरों की मार, अब जैसे सुकून देती है, शुक्रिया, तूने मेरे हाथों की लकीरें उभार दी !!  

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  11:55 घड़ी में समय हो रहा था, ‘Facebook’ खोला तो पता चला आज ‘Mother’s Day’ है, एक हाँथ में रिमोट थाम दूसरे हाँथ से, ‘Happy Mother’s Day’ लिख के माँ को ‘message’ कर दिया, ‘Technology’ भी भाई कमाल की चीज है, 1 रुपए और चंद अक्षरों ने ‘9’ महीने के कष्ट को बराबर कर…

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‘जले हाँथों’ से ‘जली रोटियाँ’ खाने में भी कोई स्वाद होता होगा, ‘पटाखों के कारखानों’ के अंदर यूँ ही भूखे पेट कोई काम नहीं करता।।

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  मेरे फ़ोन की उस हिंदी ‘keyboard’ के ‘Backspace’ बटन की, अपनी एक अनोखी कहानी है, ख्यालों को शब्दों में ढालने से ज्यादा, उसने आवारा अक्षरों को ख़याल बनने से रोका है।।  

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  ‘लालटेन’ सी रोशनी में भी’वो’ सरहद पे पहरेदारी करता है, बस इस ख्याल में की, कहीं किसी आँगन में रोशनी,हँसी, ख़ुशी और सुकून आपस में गप्पे लड़ाती होंगी।।

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  कभी 5 इंच की स्क्रीन पर उंगलियों को कसरत कराने से फुर्सत मिले तो आखों से पैगाम भेज कर देखना, लाजवाब होते हैं वो पैगाम जिनके जवाब इशारों में आते हैं|

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  तकदीर की उंगली थाम, निकल पड़ते हैं मेहनत की राह पर गरीबों के बच्चे, इनके नसीब में ‘शार्टकट’ का सुकून नहीं होता!

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  छत पे बँधी उन रस्सियों ने भी बहुत कुछ संभाल रखा है, हर दिन ‘बंद घर’ से निकलती, उस ‘खुली आबरू’ का पूरा ख्याल रखा है।।